
बरेली । बेसिक शिक्षा विभाग में इन दिनों न्याय नहीं, बल्कि रसूख और संरक्षण का पाठ पढ़ाया जा रहा है। मामला उच्च प्राथमिक विद्यालय क्यारा का है, जहां जनवरी 2025 में एक महिला शिक्षिका सीमा शर्मा के साथ कथित मारपीट और हाथ मरोड़ने की घटना सामने आई। आरोप है कि विद्यालय के इंचार्ज अध्यापक प्रमोद कुमार ने विवाद के दौरान शिक्षिका की रिंग फिंगर तोड़ दी।
हैरानी की बात यह है कि घटना के डेढ़ वर्ष बाद भी आरोपी शिक्षक के खिलाफ कोई ठोस विभागीय कार्रवाई नहीं हुई। न निलंबन, न कठोर अनुशासनात्मक कदम और न ही पीड़िता को न्याय दिलाने की गंभीर कोशिश दिखाई दी। दूसरी ओर, पीड़ित शिक्षिका लगातार मेडिकल रिपोर्ट, शिकायत पत्र और दस्तावेज लेकर अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय की भूमिका पर उठ रहा है। महिला अधिकारी होने के बावजूद पीड़ित शिक्षिका को राहत नहीं मिल सकी। विभागीय उदासीनता ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू खंड शिक्षा अधिकारी क्यारा पूरन सिंह को लेकर सामने आया है। आरोप है कि पीड़िता द्वारा मुख्यमंत्री आईजीआरएस पोर्टल पर की गई शिकायतों के जवाब में ऐसी आख्या भेजी गई, जिससे आरोपी शिक्षक को बचाने का प्रयास किया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि उनकी एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
पीड़िता का कहना है कि न्याय की उम्मीद में वह लगातार सरकारी तंत्र के दरवाजे खटखटा रही हैं, लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। सवाल यह है कि जब एक महिला शिक्षिका ही अपने विभाग में सुरक्षित और सम्मानित महसूस नहीं कर रही, तो महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के दावों का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उच्च अधिकारी इस मामले का निष्पक्ष संज्ञान लेते हैं या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगा। क्योंकि यहां सिर्फ एक टूटी हुई उंगली का सवाल नहीं है, बल्कि शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता भी कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है।