
शोध और खेत के बीच दूरी घटाने, संतुलित उर्वरक उपयोग और नई रणनीतियों पर हुआ मंथन
बरेली , भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), इज्जतनगर में आज 27वीं प्रसार परिषद की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र के विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, राज्य विभागों के अधिकारियों तथा किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।
बैठक का मुख्य उद्देश्य कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र में चल रही प्रसार गतिविधियों की समीक्षा करना, नई रणनीतियां तैयार करना तथा किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों का प्रभावी हस्तांतरण सुनिश्चित करना रहा।
इस अवसर पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक एवं संस्थान के निदेशक डॉ. राघवेन्द्र भट्टा ने कहा कि शोध और खेत के बीच की दूरी को कम करने में विस्तार सेवाएं बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों और अटारी के माध्यम से तकनीकों के प्रसार, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और किसानों के फीडबैक के आधार पर सुधार की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. भट्टा ने संस्थान की दृश्यता बढ़ाने के लिए ‘ओपन डे’, लघु वीडियो निर्माण और स्कूल–कॉलेजों के साथ संवाद जैसे नवाचार अपनाने की बात कही। साथ ही प्रभाव आकलन के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं विकसित करने पर भी जोर दिया।
वहीं, आईसीएआर के सहायक महानिदेशक (कृषि प्रसार) डॉ. आर. आर. बर्मन ने संतुलित उर्वरक उपयोग अभियान के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग से मृदा स्वास्थ्य बेहतर होता है। उन्होंने मिट्टी परीक्षण, सॉयल हेल्थ कार्ड, जैविक खाद और बायोफर्टिलाइज़र के उपयोग को बढ़ावा देने की अपील की।

उन्होंने वर्ष 2030 तक उर्वरक उपयोग में 25 प्रतिशत कमी के राष्ट्रीय लक्ष्य की जानकारी देते हुए ग्रीन मैन्योरिंग, अजोला, वर्मी कम्पोस्ट और बायोफर्टिलाइज़र पर प्रदर्शन कार्य करने का सुझाव दिया।
अटारी कानपुर के निदेशक डॉ. राघवेंद्र सिंह ने कहा कि आईवीआरआई द्वारा विकसित ‘पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज’ को कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्होंने जैविक इनपुट्स और मृदा कार्बन सुधार पर भी जोर दिया।
प्रसार शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एच. आर. मीना ने पिछले वर्ष की गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि पिछली बैठक की 18 सिफारिशों को पूर्ण रूप से लागू किया जा चुका है।
संयुक्त निदेशक (प्रसार शिक्षा) डॉ. रूपसी तिवारी ने बताया कि संस्थान द्वारा 15,521 प्रसार गतिविधियों के माध्यम से लगभग 1.45 लाख लाभार्थियों तक पहुंच बनाई गई, जिसमें महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी रही।
उन्होंने कहा कि फार्म स्कूल, प्रशिक्षण, परामर्श सेवाएं और तकनीकी साहित्य के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही किसानों की जरूरतों के अनुरूप ‘पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज’ तैयार किए जा रहे हैं, जिससे आगामी तीन वर्षों में प्रमुख समस्याओं का समाधान किया जा सके।

डॉ. तिवारी ने बताया कि विभिन्न राज्यों के साथ समन्वय बैठकों के जरिए क्षेत्रीय जरूरतों की पहचान की गई है और ओडिशा सरकार द्वारा आईवीआरआई को “नॉलेज पार्टनर” बनाने का प्रस्ताव भी संस्थान की विश्वसनीयता को दर्शाता है।
उन्होंने युवाओं के लिए जागरूकता कार्यक्रम, स्टार्टअप अवसरों की जानकारी, लो-कॉस्ट तकनीकों का प्रचार और स्वदेशी पशु नस्ल संरक्षण जैसे प्रयासों पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. एच. आर. मीना ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. आर. एस. सुमन द्वारा प्रस्तुत किया गया।
इस अवसर पर संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. एस. के. सिंह, संयुक्त निदेशक (शिक्षा) डॉ. एस. के. मेंदिरत्ता, संयुक्त निदेशक (कैडराड) डॉ. सोहनी डे, रजिस्ट्रार राजीव लाल सहित विभिन्न विभागाध्यक्ष, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी एवं प्रगतिशील किसान उपस्थित रहे।