गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर राष्ट्रीय गरिमा को कलंकित करने वाली गंदी साजिश का खलनायक कौन?:

किसान आंदोलन के बीच…..
कहीं ना कहीं गंदी सियासत घुसकर कैसे नफरत फैलाने में सफल हो गई ?
यह चिंतन का विषय है।
सरकार और पसंदीदा चैनल:
बार-बार किसान आंदोलन के बीच गंदी शक्तियों के होने का एहसास हमेशा करते रहे हैं।
उन्हें उग्रवादी ,खालिस्तानी, आतंकवादी आदि नामों से भी पुकारा गया है।
इतने बड़े आंदोलन के नाम पर ट्रैक्टर रैली को नियंत्रित करने के लिए:
क्या पर्याप्त पुलिस बल नहीं लगाया गया था ?
क्या पर्याप्त संसाधन नहीं इस्तेमाल किए गए थे ?
जिन विशेष फोर्सेस को:
बाद में किसानों को नियंत्रित करने के लिए बुलाया गया है ….
क्या उनकी मदद पहले नहीं ली जा सकती थी ?
2 महीने से अधिक वक्त तक शांति प्रदर्शन कर,
सरकार से अपनी बात मनवाने वाले, किसान आंदोलन की दिशा भ्रमित करने के पीछे कौन है ?
इसे उच्च स्तरीय जांच से ही समझा जा सकता है।
सियासत की काली दुनिया में महत्वाकांक्षा की सोच कितनी घिनौनी हो सकती है?
इसका अंदाजा लगान मुश्किल है ।
चाहे अन्नदाता किसान को तकलीफ पहुंची या हमारे जवान को .
है तो दोनों ही हमारे देश के लाल….
लेकिन किसी राजनीतिज्ञ को…..
इस से क्या लेना ?
आम आदमी ही हमेशा घायल होता है।
चाहे वह किसान हो या जवान।
हमारी इंटेलिजेंस इकाइयां सरकारी तंत्र और देश के राजधानी की महान पुलिस से भी सवाल बनता है कि:
जो किसान साफ-सुथरे ,
तीन कानून का लाभ नहीं समझ पा रहे हैं।
सरकार की अच्छी नीयत का अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं ?……
उन गोबर और गंध में जीवन यापन करने वाले गवार किसानों की घातक तथाकथित साजिश:
इतने बुद्धिमान व महान राजधानी के खुशबू पसंद कुशल समीक्षक लोग कैसे नहीं समझ पाऐ?
बताते हैं 500 ट्रेक्टर …..
लाल किला के आसपास खड़े पाए गए ।
जबकि पुलिस के ऊपर जानलेवा हमले करके,
उन पर ट्रैक्टर चढ़ाने वाले दो चार ट्रैक्टर ड्राइवर ही मीडिया के कैमरे में बार बार चक्कर मार रहे हैं!
क्या बाकी 490 ट्रैक्टर …..
जानलेवा हरकतों में नहीं शामिल थे।
यदि सारे ट्रैक्टर जानलेवा उपद्रव में शामिल होते तो पता नहीं कितना बड़ा और नुकसान हुआ होता,
किसके इशारे पर हुआ यह सब,
किसान आंदोलन निस्संदेह दिग्भ्रमित किया गया ।
और ऐसा करने वाले किसान के शुभेच्छु नहीं हो सकते ,
वे देशद्रोही हैं।
सोची-समझी किसी योजना के तहत….
देश के दुश्मनों और घातक सियासत बाजों ने ,:
केवल देश की आन बान और शान को ही नहीं चोट पहुंचाया,
बल्कि किसान आंदोलन की अब तक की त्याग तपस्या ….
और पवित्रता को भी संदेह के दायरे में ला दिया।
मशहूर फिल्म इंडियन के शंकर सिंघानिया और डीसीपी चंद्रशेखर आजाद के किरदार:
दिल्ली के इस घटनाक्रम में फिर से जीवंत हो गए हैं।
गणतंत्र दिवस की पावन पर्व पर देश विदेश के उपस्थित गणमान्य लोगों के बीच,
देश की राजधानी में होने वाली अराजकता और निरंकुशता विश्व व्यवस्था के निगहबानो से छुपी नहीं रह गई।
अभी 4 दिन पहले हम अमेरिका पर हंस रहे थे।
आज दिल्ली ही नहीं पूरा देश घायल हुआ है ।
इस विषय पर अकबरपुर नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष ,
चंद्र प्रकाश वर्मा ने भावनात्मक अफसोस व्यक्त किया ।
उन्होंने कहा कि ,
किसी भी समस्या का समाधान संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए।
हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है!
किसानों को शांति और संयम से काम लेना चाहिए।
ताकि देश की एकता अखंडता और तरक्की को बल मिल सके।
डॉक्टर मेला