
फूट डालो और राज करो की नीति हुई सफल
लखनऊ — उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन और उसके सहयोगी निगमो का निजीकरण करने की राह में प्रबन्धन का एक और जोरदार कदम हजारों की संख्या में स्थानांतरण फिर मिली चाटुकार अधि कारी अधिकारियों को पोस्टिंग के नाम पर लूट की छूट।
ट्रांसफर पोस्टिंग की इन साईड स्टोरी
जैसा कि पाठकों को पता है कि कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन में नाजायज रुप से नियुक्त महाज्ञानी अनुभवहीन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लि० के वितरण निगमन को निजी हाथों में देने का एक षड्यंत्र रचा है जिसके अंतर्गत सबसे पहले इस विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले संविदा कर्मियों के ऊपर छंटनी की तलवार लटकी है। ऐसा लगता है कि रात में सोते वक्त बड़का बाबू को सपना आया कि घाटे को कैसे कम किया जाए तो उन्होंने सुबह उठते ही संविदाकर्मियों की छंटनी एक मनमाना आदेश जो कि मांनको के पूर्णतया विपरीत था कर दिया। इसके विरोध में संविदा कर्मियों ने धरना प्रदर्शन आदि शुरू कर दिया, वार्ता हुई तो मध्यांचल के पूर्व प्रबंध निदेशक भवानी सिंह खगारावत ने बातों को समझा और छंटनी के आदेश को निरस्त करते हुए पुरानी व्यवस्था लागू करने का एक आदेश पारित कर दिया, जो कि शक्ति भवन में बैठे बड़का बाबू को नागवार लगा क्योंकि मंत्री जी भी निजीकरण के पक्ष में पूरी तरीके से है तो अपनी कार्य योजना मे शुरुआती बाधा बनने वाले इस अधिकारी को आनन फानन में ट्रांसफर कर दिया गया और इसकी जगह एक अनुभवहीन भारतीय प्रशासनिक सेवा 2017 बैच की अधिकारी को नियुक्त कर दिया गया। उसने नियुक्त होते ही सबसे पहले संविदा कर्मियों के नेताओं को धमकी देनी शुरू करी कि मैं आपको देख लूंगी, इस पर भी संविदा कर्मी डरे नहीं और अपनी बातों को मंगवाने के लिए शक्ति भवन पर धरना प्रदर्शन तथा विभिन्न जिलों में कार्य बहिष्कार हुआ। इस कार्य बहिष्कार के दौरान प्रबंधन के चाटुकार अभियंताओं ने प्रबंधन में बैठे अधिकारियों को खुश करने के लिए संगठन के नेताओं पर कार्रवाई करनी शुरू कर दी उनको नौकरियों से निकालना शुरू कर दिया, कि जिस पर नहले पर दहला मारते हुए संगठन के महासचिव/अध्यक्ष ने प्रबंधन के ही लोगों से समझौता कर लिया। अब मामला और गंभीर हो गया, अब आया समय स्थानांतरण नीति को लागू करने का तो बड़का बाबू अपनी मनमाना स्थानांतरण नीति लागू करते हुए हजारों की संख्या में अभियंता व कर्मचारी का ट्रांसफर कर दिए। यह उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन के इतिहास में पहली बार हुआ है कि इतने बड़े स्तर पर स्थानांतरण किए गए जबकि स्थानांतरण नीति पावर कॉरपोरेशन व उसके सहयोगी संस्थाओं पर लागू नहीं होती है क्योंकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि कोई भी स्थानांतरण करने के लिए आपको उच्च स्तरीय कमेटी का अप्रूवल लेना जरूरी है परंतु बड़का बाबू तो बड़का बाबू इन्होंने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को भी आंगन में टांग दिया और मनमाने तरीके से ट्रांसफर पोस्टिंग शुरू कर दिया। इस ट्रांसफर पोस्टिंग मे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की खबरें भी मीडिया में आने लगी ऊर्जा मंत्री द्वारा भी ट्रांसफर में हुए घोटालों और भ्रष्टाचार की खबरों पर कड़ी नाराजगी व्यक्त किया उनके द्वारा कहा गया कि ट्रांसफर के लिए बाकायदा लोगों से लोन लेने की बात भी कहीं जा रही है इस सरकार की छवि खराब हो रही है। ऊर्जा मंत्री का यह कहना ही साबित कर रहा है कि ट्रांसफर में किस कदर खेल हुआ है। दूसरी तरफ संघर्ष समिति ने अपने गाल बजाते हुए लखनऊ के कोने में एक पंचायत का आयोजन किया जिसमें 3000 से कुछ ज्यादा लोग व विभिन्न विभिन्न संगठनों के लोग शामिल हुए दिन भर नारेबाजी हुई भाषण बाजी हुई और अंत में जेल भरो आंदोलन कर बहिष्कार का ऐलान करते हुए सभा विसर्जित हो गई। इस घटनाक्रम से पूर्व की भी यादें ताजा होती है जिसमें राज विद्युत परिषद को जब विघटन किया गया तो तीन टुकड़े किए गए थे तब भी यही नेता ऐसे ही झूठे थे और इन्होंने ऐसे ही सारे ऐलान किए थे लेकिन हुआ क्या ढाक के वही तीन पात… वही हुआ जो उत्तर प्रदेश सरकार को मंजूर था यानि तीन टुकड़े कर दिए गए। जब-जब निजीकरण की बात होती है तो उत्तर प्रदेश में नोएडा और आगरा की बात जरूर होती है यही संघर्ष समिति उस समय भी थी लेकिन हुआ वही जो सरकार ने चाहा इनके क्रिया कलापों को देखते हुए ऐसा ही लग रहा है कि होगा वही जो सरकार चाहेगी और यह अपने गाल बजाते रह जाएंगे।
जब तीन टुकड़े हुए तो विरोध प्रदर्शन मे शिमिल मे शामिल अधिकारीयों और पदाधिकारियो ने खूब जेबें गरम की और कईयों ने तीन देशों के टूर का पैकेज बुक करके खूब यात्राएँ की एक नेता जी की चर्चा उन दिनों खूब हुई कि उनको जब अखबार में लपेट कर एक मोटी रकम मिली थी जो कि गाड़ी तक आते आते अखबार फट गया और नोटों की गड्डीया बिखर गयी जिसको नेता जी ने अपने कुर्ते के दामन में भर कर जल्दी से गाडी में बैठे कर निकल गया । आगरा के समय में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला था कि कुछ नेता विदेश में जा कर सैंडविज मसाज कराते देखें गये थे ।
विभागीय चर्चा मे सुनने में आया है कि इस बार भी आकर्षक टूर पैकेज पर अन्दर ही अन्दर चर्चा चल रही हैं। क्योंकि विभाग को तो ये लोग मरा हुआ मानकर अंतिम और लम्बा हाथ मारने की तैयारी मे लग गये हैं। खैर आगे-आगे देखिए होता है क्या ?
पाठक बड़का बाबूओं और अभियंताओं के बीच का इस द्वंद युद्ध का मजा लीजिए इसका कोई भी परिणाम निकले लेकिन कुल मिलाकर पिसेगी जनता और मरेंगे संविदा कर्मी । *युद्ध अभी शेष है*
अविजित आनंद संपादक और चंद्रशेखर सिंह प्रबंध संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ