केला,बिच्छी,केकड़ा,बांस,अपने जन्मे चारो नाश”।

एक अशुभ फूल …..

एक कहावत है —
केला,बिच्छी,केकड़ा,बांस,अपने जन्मे चारो नाश”। अर्थात केला एक बार फल देता है ।मादा बिच्छू को उसके बच्चे जन्मते खा लेते , उसी तरह बांस का खिलना या बांस में फूल आना उसके अंत का सूचक है।
यद्यपि फेंगशुई के अनुसार, बांस के पौधों को बहुत भाग्यशाली और शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि बांस के पौधों को घर और ऑफिस में रखने से सौभाग्य, धन और भाग्य की प्राप्ति होती है।
भारतीय संस्कृति में बांस को अनेक कार्यों में लाया जाता है और इसका धार्मिक महत्व बहुत है। सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारत में यह प्रचुरता से पाया जाता है । वहां की संस्कृति में इसका विशिष्ट स्थान है, वहीं पहाड़ में इसे लगाना अपशगुन मान लिया गया है।
बांस , विश्व में सबसे लंबी घास और सबसे तीव्र गति से बढ़ने वाला पौधा है।अपनी लम्बाई , दृढ़ता एवं मजबूती के कारण यह सभी प्रकार की घास से अधिक उपयोगी है। इसका वानस्पतिक नाम बंबूसा अरुंडिनेसिया है ,जो ग्रैमिनी फॅमिली का पेड़ है ये लम्बाई में बहुत ही ऊँचा होता है लेकिन मूलतः बाँस एक घास है. आपने देखा होगा, बारिश के दिनों में जब मिट्टी और हवा में पर्याप्त नमी होती है तब तक कोई भी घास खूब फैलती है और हरी भरी रहती है. बारिश का मौसम ख़त्म होते ही, जब मिटटी सूखने लगती है तो घास में मोजरें (फूल जैसी संरचना) आने लगती हैं. बिलकुल यही चीज़ बाँस के साथ भी है. वैसे तो बांस पर फूल आता ही नहीं या हम अपने जीवन काल में देख ही नहीं सकते क्योंकि बांस पर फूल 48 से 94 वर्ष बाद आता है। बांस पर फूल आने को दैवी आपदा का संकेत माना जाता है। बांस पर फूल अपने साथ विपत्ति, अकाल और मुसिबतों को साथ लाता है। इसका कारण ये है कि बांस के एक फूल से 40 से 50 तक बीज निकलते हैं, जो देखने में चावल के दाने जैसे होते हैं, लेकिन इनका रंग कत्थई होता है। कहते है , कि ये बीज चूहों को ज्यादा पसंद होते हैं, और इन्हें खाकर चूहों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। इसके बीज खाने से चूहों की प्रजनन क्षमता बेतहाशा बढ़ जाती है।
बांस के बीज खाकर ये चूहे घरों में खलिहानों में खेतों में घुसने लगते हैं। लोगों का अनाज खाते हैं, पानी की सप्लाई में इन चूहों की लाशें बहने लगती हैं। जिससे लोग खाने और पीने के लिए तरस जाते हैं। सूख जाने के बाद बांस के फूल अत्याधिक ज्वलनशील भी हो जाते हैं। दो बांसों के आपस में रगड़ने से इनमें भी आग लगने का भी खतरा रहता है। बांस के फूलों को अकाल का प्रतीक प्राचीनकाल से माना जाता है। अकाल के फूलों का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में भी मारीच और रावण के प्रसंग को बताते हुए शिव-पार्वती संवाद के माध्यम से किया है। इसमें शिव, पार्वती से कहते हैं कि ‘भय दायक खल कै प्रिय बानी, जिमि अकाल कै कुसुम भवानी।’ यानी हे! भवानी दुष्ट व्यक्ति की प्रिय वाणी भी वैसी ही भय दायक होती है, जैसे अकाल के फूल।
पर्यावरण के अनुसार बांस में फूल आना हल्की बारिश और लंबे समय तक गर्मी का प्रतीक है। बेमौसम बरसात और बांस में फूल, यह सब वातावरण में हो रहे परिवर्तन का नतीजा है। पर्यावरण के साथ होने वाले खिलवाड़ से उसमें आ रहे अप्रत्याशित बदलावों से ऐसा हो रहा है।
वर्ष 2009 में बांस के फूल खिलने से मिजोरम के लाखों लोगों को भूखमरी के करार पर खड़ा कर दिया था। मिजोरम में लगभग आधी शताब्दी के बाद खिले बांस के फूलों को खाकर चूहों की आबादी बढ़ गई थी । और इन्होंने खेतों में लहलहाती फसलों को नष्ट कर दिया और मिजोरम में अकाल की स्थिति पैदा हो गई थी।
*डॉ निरूपमा वर्मा *

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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