
जयति श्री रामचन्द्र : ।
श्रीराम के चरित्र , रामत्व का प्रत्यय
न केवल सनातन संस्कृति को प्रत्युत
विश्व संस्कृति को अलंकृत करने वाला
अति सुभग , सौम्य , आन्तरिकमूल्य की
अतिशयता से सुसम्पन्न सौन्दर्यवान प्रत्यय
है । उस चरित्र में अखिल लोक के नेतृत्व की
कल्याण की , लोकरंजन की क्षमता है ।
समस्त सुसंस्कृतियों के सारभूत सद्गुणों का
सन्निवेश उनके चरित्र में है । इसीलिए सद्ग्रंथ
सुसाहित्यकार , परमज्ञानी सन्त, आप्त पुरुष
कहते हैं—-+++++—++—–+-+-
राम: सर्वलोकाभिराम:।
वे स्वयं साक्षातविग्रहवान धर्म हैं । धर्म के मर्मज्ञ हैं
और धर्मगोप्ता भी हैं धर्म के रक्षक भी हैं और
मन से ,कर्म से , वचन से उस सद्धर्म का परिपालन करते हैं धर्म को सांगोपांग अपने आचरण में धारण करते हैं।
इस रूप में वे समग्र मानवता के आदर्श नेता और
मार्गदर्शक हैं पुनीत पावन प्रेरणा हैं ।
जैसे सत्य एक है , परमसत्ता एक है , वैसे ही धर्म का
प्रत्यय भी एक है जो अखिलमानवता के अभ्युदय और
निश्रेयस का परम हेतु है । उसके साथ कोई अन्य विशेषण जोड़ने की आवश्यकता नहीं है । धर्म धर्म है
जो हर मानव की हर प्राणी की कल्याण कामना ,
सुख संसाधनों की साधना का उपक्रम करता है । राम
उसी धर्म के धारक मर्यादापुरुषोत्तम हैं । ऐसे राम के शुभ
चरित्र के प्रति विश्व के हर धार्मिक मानव के ह्रदय मेंआदर का
भाव ,श्रध्दा का भाव ,प्रेम का भाव रहेगा यह स्वाभाविक ही है । इस रूप में श्रीराम का चरित्र सर्वधर्म समभाव की
केन्द्रीय भूमिका में हैं जो समकालीन परिस्थितियों में आज के मानव की विश्व की महती आवश्यकता है ।
वे परमवीर सर्वश्रेष्ठ महाबली धनुर्धर हैं । किन्तु उनका
शस्त्र उनका धनुष लोकहिंसाविहारी परपीड़क लोकरावणों को दण्डित करने के लिये हैं पीड़ित जन की
अभिरक्षा के लिये हैं । किसी निर्दोष निर्बल को पीड़ा देने के लिये नहीं है । उनका धनुष किसी व्यक्तिगत स्वार्थ की सम्पूर्ति के लिए नहीं है । वे बाली को जीतते हैं
किंतु किष्किंधा में प्रवेश नहीं करते । राज्य बाली के भाई को दे देते हैं । रावण को जीतकर उसकी सकलसम्पदा और राज्य विभीषण को दे देते हैं । वे नितान्त अपरिग्रही हैं । धर्मनिष्ठा की तो बात ही क्या है !
वे लक्ष्मण जी से कहते हैं–++
नेयं मम महीं सौम्य दुर्लभा: सागराम्बरा ।
हे लक्ष्मण मेरे लिये सागरपर्यन्त भूमण्डल को प्राप्त कर
लेना जीत लेना दुष्कर नहीं है इतना भुजबल और शस्त्रबल मुझ में है । किंतु ——++++++–+++–++
न हि इच्छेयम् अधर्मेण शक्रत्वमपि लक्ष्मण !
हे लक्ष्मण अधर्म आचरण करके तो मैं इन्द्र का पद भी
नहीं चाहता । त्रिलोकेश्वर भी नहीं बनना चाहता ।
सद्धर्म का परिपालन ,उसे अपने आचरण में समग्रत:
उतार लेना ही मेरा अभीष्ट है ।
राम के समस्त उत्कृष्ट गुणों का वर्णन यहां सम्भव नहीं ।
केवल इतना कहना पर्याप्त है कि ऐसा कोई धर्म का लक्षण गुण नहीं जो इसचरित्र में न हो । इसीलिए कहा
गया है——
राम: विग्रहवान धर्म : ।
राम धर्म का शरीर हैं केवल शरीर ही नहीं आत्मा भी हैं ।
राम केवट के, निषादराज के ,सुग्रीव के , शबरी के ,चातुर्वर्ण के सर्वधर्म के , सर्वजाति समुदाय के प्यारे लोकनायक
पुरुषोत्तम परम पुरुष हैं ।
उनमें अखिलमानवसमाज को एकता के ,प्रेम के सूत्रों में
बांधने की क्षमता है ।
आवश्यकता यह है कि हम राम के इस—–++—+-+
सर्वलोकाभिराम चरित्र को विश्वमानव के समक्ष अपने
सम्यक आचरण से निष्कपट व्यवहार से प्रेम से रखें ।
जयति श्रीरामचन्द्र :।
आचार्य कविकिंकर