
@,फिर वही पुतला और जश्न—–
हमारे देश और कल्चर में कुछ अजीबो गरीब परम्पराएं है जो ना चाहते हुये भी करनी पड़ती है जैसे कि रावण की मौत का जश्न जो बार्शिक पर्व में हम मनाते हैं आजके बदलते परिवेश में हम नजर डालें तो लगभग एक घर छोड़कर रावण की परवरिश हो रही है लेकिन वहां पर इसे खत्म करने के लिये सरकार, समाज, कानून, प्रशासन,कोई नजर नहीं आता जो इन रावणो को संस्कारों से बेटा पिता,पती,या इंसान बनाया जाए जिससे समाज की अपराधिक और घिनौनी धूल साफ हो लेकिन रावण की मौत का जश्न और उसका पुतला बनाने में अनगिनत पैसे को आग लगाकर समाज में उस रावण की हकीकत दिखाई जाती है जिसने सीता जैसी सती को अपने घर में नजरबंद करने के बाद भी पवित्र रखा था आजके रावण तो घरों और सड़कों में खुलेआम बहू बेटियों की आबरू और जान को खा रहे हैं क्यों इन नर और आबरू के भक्षकों अमानुषो को सुधारने का कोई ठोस साहस नहीं होता है सर्मनाक जब आबरू तार-तार और जान अलविदा हो जाती है तब चलता है कानूनी डंडा जो बर्षो अदालतों में पीड़ित ठोकरें खाकर भी इंसान से अछूता रह जाता या फिर दुनियां से विदा हो जाता है और इंसाफ अदालतों में—-सच कहूं तो हमें वह रावण आजके रावणो से कहीं ज्यादा अच्छा लगा जो दिलकी बात सीता के सामने अकेले कहता था आकर और चला जाता था कभी अपने शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया सीता के सामने क्यों कि वह भलीभांति जानता था अपने उस कृत्य को और राम और सीता भी जो रावण अजर अमर शिव शंकर का भक्त था और इन कृत्यों को क्यों और कैसे कर रहा है रावण को अपना अंजाम अच्छी तरह पता था फिर भी अहंकार को नहीं त्यागा वह बहुत बड़ा विद्वान भी था जिसका ऐतिहासिक हस्र क्या—-खैर यूंतो लिखने के लिये बहुत कुछ है पर हम तो यही संदेश देंगे कि राम और रावण के इतिहास को आप हर साल मंचासीन करें जिससे कि हमारी पीढी बदलते परिवेश में सत्य और असत्य को न भूल पाए पर रावण के पुतले का जश्न मनाना हमारी कमजोरी को दर्शाता है,तब जबकि अपने घरों में पलते रावणों को हम स्वर्ग जैसी परवरिश में पालते जा रहे हैं आजतक एसी कोई रामराज्य की सरकार नहीं बनी जो औरत की परवरिश कर सके कहीं कम तो कहीं अती का सिलसिला जारी है बस औरत को जरूर बाहर निकलने से पहले यह सोचना होगा कि वह खुद ही अपनी मुक्तिदाता है और कोई नहीं पराधीन सपनेहुं सुख नाही के सबक के साथ ही अपनी कर्मभूमि पर उतरना ही नारी शक्ति और मुक्त है, सोचकर यह दुनियां तो मरे रावण के जश्न में डूबी है,
सीता सती थी जो तिनके से बच गई तुझे तो बंदूक उठानी होगी,
ये मिट्ठू योद्धाओं केभरोसे,तेरे जिश्म के सौदागर तो हो सकते हैं, कृष्ण और राम तो कभी नहीं।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान