पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने के लिए पूरी तरह तार्किक आदेश जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

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पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने के लिए पूरी तरह तार्किक आदेश जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

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????सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने के लिए कोर्ट की ओर से पूरी तरह से तर्कसंगत आदेश जारी करना अनिवार्य नहीं है। (केस: प्रदीप एस वोडेयार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर एक अपील पर विचार कर रही थी, जिसने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया था।

????अपीलकर्ता एक कंपनी के प्रबंध निदेशक था। वह खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत अनधिकृत खनन से संबंधित अपराधों के लिए आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहा था। उसका एक तर्क यह था कि स्पेशल जज की ओर से एमएमडीआर एक्ट के तहत संज्ञान लेने के लिए पारित आदेश कानून में अस्थिर है, क्योंकि इसमें कोई तर्क दर्ज नहीं किया गया था। इस तर्क को प्रमाणित करने के लिए अपीलकर्ता ने पेप्सी फूड्स लिमिटेड बनाम विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (1998) 5 एससीसी 749, फखरुद्दीन अहमद बनाम उत्तरांचल राज्य (2008) 17 एससीसी 157, महमूद उल रहमान बनाम खजीर मोहम्मद टुंडा (2015) 12 एससीसी 420, सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई (2015) 4 एससीसी 609 के फैसलों पर भरोसा किया।

????दूसरी ओर कर्नाटक राज्य ने गुजरात राज्य बनाम अफरोज मोहम्मद हसनफट्टा के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि अगर पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लिया जाता है तो मजिस्ट्रेट कारणों को दर्ज करने के लिए बाध्य नहीं है। यह तर्क दिया गया कि एक निजी शिकायत और एक पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लेने के लिए अलग-अलग मापदंड हैं। जबकि पहले मामले में कारणों को दर्ज करने की आवश्यकता है, बाद के मामले में यह अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।

⚫सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के तर्क को स्वीकार कर लिया। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता द्वारा भरोसा किए गए अधिकांश निर्णय निजी शिकायतों से पैदा मामले थे। सुनील भारती मित्तल में मजिस्ट्रेट एक अभियुक्त को सम्मन जारी किया था, जो आरोप पत्र में नामित नहीं किया गया था। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट को कारण दर्ज करने थे। हालांकि, मौजूदा मामले में विशेष जांच दल द्वारा दायर एक रिपोर्ट के आधार पर विशेष जज ने आरोपी के खिलाफ संज्ञान लिया।

❇️ कोर्ट ने अफरोज मोहम्मद हसनफट्टा के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि चूंकि पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान के मामले में मजिस्ट्रेट को सामग्री पढ़ने का फायदा होता है, इसलिए उसे कारणों को दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होती है। मामले के निष्कर्ष में कोर्ट ने कहा, “चूंकि स्पेशल जज ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संज्ञान लिया था, न कि एक निजी शिकायत के आधार पर, स्पेशल जज के लिए पूरी तरह से तर्कसंगत आदेश जारी करना अनिवार्य नहीं है..”

केस शीर्षक: प्रदीप एस वोडेयार बनाम कर्नाटक राज्य
प्र‌तिनिधित्व: अपीलकर्ता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और प्रवीण एच पारेख;
कर्नाटक राज्य के लिए एडवोकेट निखिल गोयल सिटेशन: एलएल 2021 एससी 691

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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