अलीगढ़ 17,मुर्दों और 14,तढपती मूंक भाषा मे मौतकी कहानी–

#अलीगढ़ 17,मुर्दों और 14,तढपती मूंक भाषा मे मौतकी कहानी–
मौत का दूसरा सुरक्षित दरवाजा-
दुकान सरकारी है चलो एक प्रायवेट दूसरा दरवाजा और खोल लेते है,जहां मौत के आने जाने पर कोई नजर या पहरा नहीं होगा,
आदमी की खोलमे पैसों की मशीन,बड़ी बेरहम है,यह मानव की साँसे पीसकर गड्डियां बनाने का काम करती है,कितना सातिर हो चला है आजका आदमी रास्ते तराशता है,हर संम्भव सिर्फ पैसे कमाने के फिर चाहे कैसे भी कमाया जाए,अलीगढ़ शराब की कहानी अबतक17मुर्दों और 14 तढपती मानल की मूंक और मौन भाषा मे गवाही दे रहे है,तब मानव गुलिस्तां मे ये जहर क्यों जो मासूमियत से छत छीन रही है गोद से ममता, मांग से सिंदूर,
इससे भी भयानक मंजर पूर्व की कुछ सालों पहले,एटा मे भी हुआ था जो मानव लासो के ढेर लग गये थे,लेकिन सबक कहीं से भी शासन, प्रशासन, को नहीं मिला,क्यों कि मौत,गलती,बीमारी, हर हादसे पाटने के लिये पैसा हैना,फिर बाजार वह क्यों खत्म किया जाए जो गड्डियों की फसल उगाती हो।काश बाजार के निर्माताओं ने कोई अपना खोया होता तो सीख के लिये शमशान मकानो से ज्यादा आवाद हो रहे है,जिस समाज,सरकार मे मानव की छतिपूर्त पैसे से की जाने लगे तो औरत की बुढापे मे प्रसवपीड़ा नाशूर बनना लाजिमी है,सरकारें आवाम की माई बाप होती है,लेकिन बदलती राजनीति मे ये गोदों मे मुर्दे खिलाने की आदी होती जा रही है,नहीं तो मानव समाज मे सरकारी और गैर सरकारी जहर का बाजार आखिर क्यों हम देख रहे है,कि जो कलके भविष्य के कर्णधार होगे वह हाथ मे बोतल बगल मे औरत का सब्जेक्ट पढ रहे है,है कोई कोरे पन्नों पर नया इतिहास देश समाज, और परिवार को बचाने और रखाने का आजका युवा अगर माँ बाप उनके एसो आराम के लिये खर्च नहीं देते है तो क्या करते है,घरों और पब्लिक का खून और चोरी ऐसे युवाऔं से हम क्या भविष्य की उम्मीद रखे जिन्हें हमने लक्ष्य से खुद भटका दिया हो,आज हर तरफ ब्यबस्थाऔ का मारा हुआ है मानव खुदकी जिंदगी नहीं स्वतंत्र जी सकता तो हाशिल इन हालातों से क्या कर सकता है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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