कलम से बड़ी कोई ताकत नही–


कलम से बड़ी कोई ताकत नही–
-कहते हैं अति हर चीज के लिये बुरी होती है,चाहे खुशी हो या गम खुशी मे ज्यादा हंसना भी सेहत और करेक्टर पर भारी पड़ जाता है हम कभी-कभी इतना हंसते है कि अपने पदकी गरिमा को तार-तार कर लेते है,एसा कौनसा इंसान है जिसके अंदर पर्शनल फीलिंग नही है पर उनको कैसे अटैंड करना है,यही हमारे करेक्टर और नीयत की सबसे बडी़ पहचान होती है,हमारे अदंर भावों की कोख से जो शब्द जन्म लेते है,उनकी क्वालिटी जब जुवान, और कागज पर तस्वीर बनकर उभरती है,वही हमारे ब्यक्तित्व की कुंडली होती है,कल त्रिस्तरीय चुनावों की मतगणना शुरू हो गई एटा मे बंगाल दिल्ली और देश के कौने कौने का समाचार था पर हमारे एटा का समाचार कौना जीरो—बजह खुदको मिटाने की यहीं से शुरू होती है कि हम अपने कार्य को लेकर कितने बफादार है और रहे जब हम खोखले अंहकार के वशीभूत—-फिर चाहे राजनीति, हो कानून, या कलमकार, निष्पक्ष भूमिका मे जबतक रहती है तभी तक जिंदा और सौहरत हासिल कर सकती है और जब यह पक्ष्पात मे डूब जाती है तो खुदका विनाश कर लेती है बात को फेस करना कलम की पहचान है,पब्लिक को समान समझना सरकार की भूमिका,हमे ईश्वर ने मानव जन्म दिया है,ऊपर से सोने मे सुहागा कि कुछ पद जो हमे मिले है नशीब से वरना इतनी बडी़ जनसंख्या मे बिना पहचान के जन्म और मृत्यु को कितने प्राप्त हो जाते है पता भी नहीं चलता हम इंसान है इंसान बने रहे यही काफी है,मौसम को मौसम रहने दे,इन बदलती कुर्सियों ने जाने हमसे क्या क्या छीना है और हम अपनी बदलती नीयतों से शहर गांव बेच देते है पांच साल के लिये,एटा की थाली मे छेद इसी पक्ष्पात के हथियार से हमेशा होता रहा है परिणाम इसके सबके सामने है,सड़कें, शिक्षा, मनोरंजन, यातायात, अपराध,एटा की पहचान बनकर रह गया,अबसे लेकर पूर्व की सरकारों के कार्यकाल मे झांकिये,एटा के विकास मे, छीना जरूर है दिया क्या बताए–मै कतई नहीं संकोच करूंगी लिखने मे कि एटा के विकास के रोड़े हमखुद है,पक्ष्पात—तब गिरने के गड्ढे भी कई प्रकार के होते है एक गिरकर संभलने को संघर्ष का मसीहा भी कहते है,दलदल इसमे जिंदा मौत का अनुभव भी है करेक्टर से गिरा इंसान जिंदगी भर खुदसे नजरे मिलाने के—-कुछ पत्रकारिता तो यहां दिनभर होती है तिलका ताड़ बनाने और किसी की पोस्ट पर भूलबस किसी पर मात्रा या डंडा मिस हो गया पर ही अदालत लग जाती है। याद रखना होगा हम जो हैं वही रहेंगे तो उसको चमकाओ ज्यादा अच्छा होगा इन आती जाती कुर्सियों की पर पोलिस करने से बेहतर है कि इनपर बिराजमान देवताओं की कार्यप्रणाली पर हमारा फोकस रहना हमारे काम और पदकी गरिमा है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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