यूपीएटाशासनप्रशान,

एटा,ट्रेन–
आखिर हर बार क्यों आस बेआस हो जाती है।
आने लगे एटा ट्रेन लौली पौप घाटे के आंकड़े, मगर क्यों हर बार पब्लिक के मुंह मे मिठास घौलकर वोटों की राजनीति की जाती है,क्या इसका कोई समाधान नहीं बना है, या फिर एटा के नशीब पर घाटा लिखकर पब्लिक के अधिकारों का हनन इसी प्रकार होता रहेगा अगर सरकारों के पास एटा की पब्लिक के लिये कुछ नहीं है तो इतनी दिमागी कसरत की क्या जरूरत है,एटा की बदसूरती, और पब्लिक को चिढाकर होशियारी दिखाने की इसका मतलब साफ है कि पब्लिक पागल है और नेता—–शर्मनाक कि एक छोटा टुकड़ा भीअगर कासगंज एटा का जुड़ जाता तो एटा की बहुत सी समस्याएं खत्म हो जाती लेकिन यह एजेंडा भी हर बार चुनाव मे नापतोल का हिस्सा बनकर रह जाता है,न कोई उद्योग न कोई ट्रेन सुबिधा न कोई पब्लिक का मनोरंजन नाही कोई उच्च शिक्षा जो नई सोच के साथ पैदा हुई पीढी की मंजिलों के अंधेरों मे रौशनी की किरण बनकर— जो देश के भविष्य कर्णधार होते है,सुबिधाए हैना मुहैया कदम कदम पर सरकारी गैर सरकारी शराब और धूम्रपान जो आजकी पीढी के साथ बंद आँखों से भी देखी जा सकती हाथ मे बोतल और बगल मे लड़की एटा का नशीब तो शराब मे डूबा हुआ है,यह जितनी पकडी़ जाती है गंगाजल की तरह उतनी ही बढ़ती जाती है आखिर क्यों सूरत और सीरत के सवाल जैसे—-एसा कौनसा अपराध है जो कानून और सरकार से ऊपर हो लेकिन है—-फिर एटा अपराध मुक्त क्यों होगा क्यों कि न पब्लिक चाहती है न सरकारें यहां खुद नशीब लिखने को मजबूर है इंसान नहीं तो दूसरा रास्ता सभ्य इंसान के लिये पलायन के शिवाय कुछभी नहीं है,क्यों कि बदलती सोच के लिये जिंदगी जीने का यहां कोई साधन है ही नहीं,या तो कोलू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बांधकर चलते रहो या मन मसलकर जीने की आदत डालकर एटा मे—पूर्व से लेकर किसी भी सरकार का एटा के लिये कार्य सराहनीय नही रहा जो हुआ भी वह ऊँट के मुंह मे जीरा के समान रहा जीटीरोड, हो या कालोनियों की सड़कें एक बार निकल जाओ सकल और कपड़ों के रंग बदल जाते है,जितनी नेताओं की बाढ़ है उतना ही शर्मनाक कार्य यहां बहुत कड़वा सत्य है लिखने को अगर लिख दिया तो कलम विवादों मैं न फंस जाए यह सोचकर इशारों में तोतली भाषा लिखनी पड़ती है,आखिर हर बार आस बेआस पब्लिक की क्यों हो जाती है।