
प्राचीन काली भारेश्वर मंदिर पर हजारों की भीड़, प्रशासन रहा मुस्तैद
-चंबल की कगारों में 444 फीट की ऊंचाई पर 108 सीढ़ियों से सुसज्जित भारेश्वर मंदिर भरेह धाम पर हजारों श्रद्धालुओं की भीड़
-हजारों वर्ष पुराना भारेश्वर मंदिर पर हजारों की हुई भीड़ भक्तों ने मांगी मिन्नतें
-सुरक्षा की व्यवस्था को देखने व भारेश्वर मंदिर पर जलाभिषेक करने पहुंचे एसपी ग्रामीण ओमवीर सिंह
-सुरक्षा की दृष्टि से थाना प्रभारी अखिलेश कुमार पाल मिले मुस्तैद, पर एसपी ग्रामीण में की तारीफ
-चकरनगर क्षेत्र में सबसे ज्यादा भीड़ इस परम स्थली धाम में होती है इसलिए सुरक्षा की की गई कड़ी व्यवस्था
-सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था को देखकर प्रशिक्षु 10 जवानों को ड्यूटी पर एसएसपी आकाश तोमर ने किया तैनात निज संवाददाता द्वारा *चकरनगर/इटावा।* यमुना चंबल संगम पर स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर प्राचीन काल से आध्यात्मिक ज्ञान एवं तपस्या का केंद्र रहा है। मान्यता है कि विद्वान नीलकंठ ने कर्मकांड एवं दंड के 12 मयूक (ग्रंथ) एवं आयुर्वेदिक ग्रंथ इसी मंदिर में रहकर लिखे थे। कभी कुख्यात डाकुओं की शरणस्थली के तौर पर बदनाम उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में चंबलनदी के किनारे स्थापित भारेश्वर महादेव का हजारों साल पुराना मंदिर महाभारत के मुख्य पात्र पांडवों की आस्था का केंद्र रहा है। भारेश्वर मंदिर 444 फीट ऊंचाई पर बना है, जहां तक पहुंचने के लिए 108 सीढ़ियां हैं। बनारस के विद्वान नीलकंठ भट्ट ने भगवन्त भास्कर नामक ग्रंथ में मंदिर की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है। कृत शालिनी मध्य देशे ख्याता भरेह नगरी, किल तत्र राजा राजीव लोचन रतो भगवन्त देवा। स्वतंत्रता संग्राम से भी इस मंदिर का ताल्लुक रहा है। बताते हैं कि भरेह के राजा रूपसिंह ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ इस स्थल पर सेना की प्रशिक्षण कार्यशाला बनाई थी। बुजुर्ग बताते हैं कि एक बार जब अंग्रेजों ने मंदिर को घेर लिया तो मंदिर से निकले बर्रो ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। यमुना चंबल संगम पर स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर प्राचीन काल से आध्यात्मिक ज्ञान एवं तपस्या का केंद्र रहा है। मान्यता है कि विद्वान नीलकंठ ने कर्मकांड एवं दंड के 12 मयूक (ग्रंथ) एवं आयुर्वेदिक ग्रंथ इसी मंदिर में रहकर लिखे थे। वताया जाता है कि मार्ग जाते समय गोस्वामी तुलसीदास भी इस मंदिर में कुछ समय रहे। परमहंस गुंधारी लाल ने भारेश्वर महाराज की तपस्या कर अपना कर्मक्षेत्र ग्राम बडेरा को बनाया। परमहंस पुरुषेात्तम दास महाराज ने बिना भोजन व जल के भोलेनाथ की तपस्या की। बुजुर्गो के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के समय भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर शंकर भगवान की आराधना हेतु भीमसेन द्वार व शंकर की विशाल पिंडी की स्थापना की थी, जिसकी द्रोपदी सहित पांचों पांडवों ने पूजा अर्चना की। मान्यता के अनुसार जो भक्त भगवान भोले नाथ की पूजा करके बाहर विराजमान नंदी के कान में जो भी मनोकामना मांगता है। वह शीघ्र ही पूरी हो जाती है। मंदिर के पुजारी चंबल गिरि महाराज बताते हैं कि सीढ़ियों की बनावट व मंदिर का शिखर यह बताता है कि यह द्वापर युगीन है। इस तथ्य पर कई विद्वान भी एक मत हैं। मुगलकाल में जब व्यापार नदियों के माध्यम से होता था। तब भरेह स्थान उत्तर भारत का प्रमुख व्यापार केंद्र था। उस समय गुजरात व राजस्थान के व्यापारी अपना माल चंबल नदी के माध्यम से तथा आगरा, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा के व्यापारी यमुना नदी के माध्यम से अपना माल इलाहाबाद, बिहार व कलकत्ता भेजते थे, जहां से विदेश तक माल जाता था। उन दिनों यमुना चंबल के संगम पर विशाल भंवरें पड़ती थीं, जिसमें नाव फंसने पर नाव नदी में ही डूब जाती थी। मंदिर निर्माण के पीछे किंवदंती है कि राजस्थान के एक व्यापारी मदनलाल की नाव यहां सैकड़ों साल पहले यमुना के भंवर में फंस गयी थी। सामने भारेश्वर महादेव का मंदिर है जिस कारण व्यापारी ने महादेव से प्रार्थना की यदि उसकी जान बच जाये तो सारा धन मंदिर में लगा देगा। देखते ही देखते व्यापारी की नाव किनारे आ गयी और इस तरह व्यापारी ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया तब से लेकर आज तक मंदिर में निर्माण नहीं कराया गया है। मंदिर के नजदीक बह रही चंबल में डाल्फिन पायी जाती है जिसे देखने के लिए कभी कभार विदेशी सैलानी मंदिर में आते हैं। यह प्राचीन मंदिर उपेक्षा का शिकार है। न तो प्रशासन और न ही जनप्रतिनिधियों ने इसके पुनरोद्धार पर नजर दौड़ाई। पर यहां पर यह बात कहना लाजमी होगा कि कुछ भले अधिकारी कभी कभार आ जाते हैं तो वह सरकारी खजाने से लेकर अपनी पॉकेट तक भी ढ़ीलीकर जीर्णोउद्धार में अपना सहयोग देते हैं, लेकिन इस सहयोग का वह किसी प्रकार का कहीं प्रचार-प्रसार नहीं होने देते। यदि मंदिर स्थल को विकसित कर दिया जाये तो यह मंदिर देश के प्रमुख मंदिरों में अपना नाम दर्ज करायेगा, साथ ही पर्यटन का केंद्र भी भरेह बन सकेगा। पर्यटन के लिहाज से यह मंदिर खासा महत्वपूर्ण है, लेकिन इस ओर कोई कोशिश प्रशासनिक स्तर पर नहीं की गयी। चंबल बेली संगम में स्थित भारेश्वर महादेव के पावन स्थान पर एस समय भागवत कथा का आयोजन किया जारहा है इस मौके पर महा शिवरात्रि का पर्व भी है जिससे इस पर्व पर लोग काबडी यात्रा पूर्ण करने जाते हैं। इस यात्रा में एक विशेष महंत होता है जिस के दिशानिर्देश अनुसार यात्रा को पूरा किया जाता है। जब हमारे संवाददाता ने महंतो से विशेष बर्ता की तो बताया कि श्रृंगी ऋषि धाम से गंगा जल को उठाया जाता है और भारेश्वर भगवान के मंदिर में जलाभिषेक किया जाता है। आज इस मौके पर ग्राम पंचायत भरेह के प्रधान पद प्रत्याशी और पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह सेंगर ने अपर पुलिस अधीक्षक (ग्रामींण) ओमवीर सिंह को मंदिर से लेकर संगम तक का नजारा दिखाया। एसपीआरओ ने बताया की हमारे क्षेत्र में सबसे ज्यादा भीड़ इसी स्थान पर होती है इसलिए पुलिस प्रशासन सजक्ता से मुस्तैद है। इसी लिए दूर दूर से आए भक्तों को सुगमता से दर्शन भी हो रहे हैैं। आपको बताते चलें कि भारेश्वर भगवान के मंदिर में प्रतेक वर्ष इसी तरह आयोजन किया जाता है और इस आयोजन में समस्त ग्राम वासियों और प्रशासन का योगदान होता है। थानाध्यक्ष भारेह अखिलेश कुमार पाल इंस्पेक्टर ने बताया कि यहां पर हजारों की भीड़ का अंदाजा चलते पुलिस प्रमुख आकाश तोमर से अतिरिक्त बल की मांग की गई थी जिस पर मान्यवर ने 10 प्रशिक्षु जवानों को तत्काल मुझे मुहैया कराया जो आज ड्यूटी पर तैनात है। सूत्रों की माने तो सपा प्रत्याशी के रूप में ख्याति प्राप्त जिला पंचायत चकरनगर प्रथम से राजेश सिंह चौहान उर्फ बबलू भैया ने यहां पर हो रहे भागवत प्रोग्राम में कार्यक्रम संचालकों को किसी भी आर्थिक मदद के लिए पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया। भंडारे में भी सब्जी या जिस भी चीज की जरूरत है वह मुझे बताई जाए मैं भगवान शंकर के चरणों में श्रद्धा के साथ अर्पित करूंगा। यहां पर श्रीमद् भागवत कथा में व्यास गद्दी पर इमलिया वाले पंडित जी राकेश कुमार जी अपनी मधुर वाणी से सभी को तृप्त करते हुए नजर आए। इस मौके पर भाजपा जिलाध्यक्ष अजय धाकरे ने भी समस्त पदाधिकारियों के साथ दर्शन कर माथा टेका। सूत्रों की मानें तो भाजपा जिला अध्यक्ष ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में अपने सभी प्रत्याशियों को भारी मतों से विजई बनाने का भी आशीर्वाद लिया।