वैवाहिक विवाद पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को सजा देना ही नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट

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वैवाहिक विवाद पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को सजा देना ही नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट

⚫इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को सजा देना ही नहीं है, बल्कि सामाजिक शांति, सौहार्द, अपनापन व संपन्नता बनाए रखना भी है। कोर्ट न्यायहित में सीआरपीसी की धारा 482 के तहत प्राप्त अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग विवाद के किसी भी स्तर पर कर सकती है।

????कोर्ट ने सरकार की तरफ से अशमनीय अपराध को निरस्त करने की अधिकारिता पर की गई आपत्ति को अस्वीकार कर दिया और कहा कि समाज की बेहतरी के लिए न्यायालय को न्यायहित में हस्तक्षेप करने का अधिकार है। खासतौर पर वैवाहिक विवाद की स्थिति में, जब विवाद खत्म कर पति-पत्नी साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हों।

????कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि इसमे युवावस्था कोर्ट के चक्कर लगाने में ही बीत जाती है और हासिल कुछ नहीं होता।

????पति-पत्नी के बीच एक छत के नीचे बच्चे के साथ सुखी जीवन बिताने के लिए समझौता हो गया है और वे पिछली कड़वाहट भूलकर एकसाथ रहने लगे हैं तो यह समाज के लिए एक आदर्श स्थिति है। कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसी स्थिति में न्यायालय ने अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग कर वैवाहिक विवाद को खत्म नहीं किया तो इससे न केवल पति-पत्नी का पारिवारिक जीवन बर्बाद होगा बल्कि नाबालिग बच्चे का भविष्य शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा।

यह आदेश न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने प्रमोद व अन्य की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

????इसी के साथ कोर्ट ने याची के सुखमय वैवाहिक जीवन को देखते हुए दहेज उत्पीड़न केस में उसे अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट गाजियाबाद की अदालत से मिली सजा व आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। साथ ही कहा कि सजा रद्द होने से अपील अर्थहीन हो चुकी है, जिसे कोर्ट खत्म कर देगी। कोर्ट ने यह फैसला गगन सिंह केस सहित दर्जनों निर्णयों पर विचार करते हुए दिया है।

????याची के खिलाफ पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का केस किया। पुलिस की चार्जशीट के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई, जिसकी अपील दाखिल की गई। इसी बीच पति-पत्नी में साथ जीने का समझौता हो गया और कोर्ट से केस बंद करने की मांग की।

????सुनवाई न होने पर याचिका दाखिल कर कार्यवाही रद्द किए जाने की मांग की गई थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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