चंबल टूरिज्म से हजारों को मिल सकता है रोजगार

चंबल पर्यटन मानचित्र पर बाह की धमक

  • बाह के पर्यटन का कोई सानी नहीं

-अंतराष्ट्रीय स्तर पर जड़े जमा रहा चंबल टूरिज्म

-चंबल टूरिज्म से हजारों को मिल सकता है रोजगार

फोटो 1 से 6 तक शाह आलम
बाह, आगरा।

ऐतिहासिक इटावा महोत्सव में चल रहा चंबल टूरिज्म कैम्प इन दिनों चर्चा में बना हुआ है जिसमें बाह, आगरा जनपद के ऐतिहासिक स्थलों की तथ्यात्मक और प्रमाणिक जानकारी दी जा रही है। इस दौरान इको टूरिज्म को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। ताकि अपने आस-आस विश्व स्तरीय टूरिज्म का लुत्फ उठाया जा सके। आजादी से पहले संयुक्त प्रांत के इटावा शहर में सन 1910 से शुरू होई ऐतिहासिक नुमाइश की चर्चा हर आमो व खास की जबान पर रहती है। आस-पास के जनपद के निवासियों के एक महीने तक चलने वाली यह नुमाइश सालाना बड़े जलसे में तब्दील हो गई है। देश में इटावा महोत्सव का अपना अलग तरह का स्थान है। हर वर्ष नवंबर-दिसंबर के महीने में आयोजित होने वाली इटावा नुमाइश की तैयारियां काफी पहले से शुरू हो जाती हैं। एक महीने तक चलने वाले इटावा महोत्सव में विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। जिसमें मनोरंजन के साथ लोग खरीदारी करते हैं। एक महीने के दौरान देर रात तक बड़ी तादाद में नुमाइश मैदान पर तांता लगा रहता है।

नवंबर-दिसंबर के महीने में हर वर्ष होने वाला आयोजन इस बार 31 जनवरी से 1 मार्च के तक आयोजित हो रही है। कोरोना काल के दौरान लोगों को लंबे समय बाद कैद से निजात तो मिली है। ऐसे में इटावा महोत्सव के विकास प्रदर्शनी में लगी ‘चंबल पर्यटन’ प्रदर्शनी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर रही है। चंबल टूरिज्म कैम्प पर जानकारी लेने वालों का देर रात तक जमावड़ा लगा रहता है। लंबे समय से दस्यु सरगनाओं की वजह से बदनाम रहे चंबल के बीहड़ों में ‘चंबल फाउंडेशन’ पर्यटन की खिड़की खोल रहा है। जिन स्थलों के बारें लोगों की अब भी नजर नहीं पड़ी है। चंबल टूरिज्म रोमांच के साथ कई रहस्यों से पर्दा उठाएगा।

चंबल फाउंडेशन के चंबल पर्यटन केन्द्र में डर और दशहत के पर्याय रहे चंबल के बीहड़ों से जुड़ी तमाम जानकारियां चित्र प्रदर्शनी के द्वारा दी जा रही है। जिसे देख सुनकर लोग दांतो तले अंगुली दबा लेते है।

चंबल अब विश्व के साथ कदमताल करना चाहता है। जिसमें चंबल फाउंडेशन एक सेतु के रूप में विभिन्न सरोकारी और साकारात्मक कार्यक्रमों के जरिए जागरूकता ला रहा है। चंबल पर्यटन कैम्प में विभिन्न मानचित्रों, तस्वीरों, जड़ी-बूटियों, दस्तावेजों आदि के मार्फत जानकारी दी जा रही है। चंबल रीजन के तीन प्रदेशों के 7 जनपदों इटावा, औरैया, जालौन, बाह (आगरा) भिंड, मुरैना और धौलपुर का पर्यटन मानचित्र भी लगाया गया है जिसमें सामाजिक-सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों पर फोकस के साथ स्थानीय खान-पान की भी जानकारी दी जा रही है।

बाह के पर्यटन का सानी नहीः शंभुनाथ स्मारक कचौरा घाट, चंबल सफारी, नौगवां किला, बेचिराग गांव विठ्ठौना, हथकांत दुर्ग, पिनाहट किला, बटेश्वर धाम, गेंदालाल दीक्षित का जन्मस्थान मई गांव, श्री दिगंबर जैन मंदिर शौरीपुर, होलीपुरा गांव आदि प्रमुख हैं।

चंबल फाउंडेशन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चंबल घाटी की बेहतरी के लिए हमख्याल मित्रों के जनसहयोग से विविध कार्यक्रम-प्रशिक्षण आयोजित करता रहता है जिसमें चंबल हेरिटेज वाक, चंबल मैराथन, चंबल यूथ फेस्टिवल, चंबल लिटरेरी फेस्टिवल, चंबल जनसंसद, चंबल दीप पर्व, चंबल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, सुनील जाना स्कूल आफ फोटोग्राफी, अवाम का सिनेमा, चंबल संग्रहालय, चंबल बर्ड वाचिंग एंड क्रोकोडाइल रिसर्च सेंटर, चंबल कैपिंग, एडवेंचर्स स्पोटर्स,राफ्टिंग एंड हाइकिंग आदि प्रमुख हैं। बीहड़ देशी-विदेशी सैलानियों से गुलजार हो और स्थानिय लोगों को रोजगार के अवसर मिल सकें। चंबल फाउंडेशन चंबल मेनीफेस्टो को लागू कराने की मुहिम के साथ 964 किमी की पदयात्रा कर चंबल नदी के विविध पहलुओं का अध्ययन करने जा रहा है।

पीले सोने के लिए सुविख्यात सरसो के फूलों से सजी धजी घाटी, चंबल की वादियों में मिट्टी के स्पर्श को उकसाते पहाड़ों, भूतल के स्पर्श की तरंगे पैदा करते भरखों के बीच, बाजरे और तिल से लकदक खेत-खलिहानों और मचानों के बीच सुदूर रेतीली रश्मियों, डाल्फिनों की अगड़ाई, दुर्लभ चिड़ियों का कलरव, घड़ियालों की मौजमस्ती, विशाल कछुओं का तैरना, स्वच्छ पानी की धीमी मधुर आवाज, बागियों के ठिकाने, किले, मठ, मंदिर, धरोहरों तक तमाम ऐसे दृश्य हैं जो लोगों को नई जानकारी और ऊर्जा से लबरेज कर देती है। इससे इको टूरिज्म को बल मिलेगा और ग्रामीण पर्यटन से गांव-गिरांव की सेहत सुधरेगी।

इटावा महोत्सव के नुमाइश ग्राउंड पर विकास प्रदर्शनी में एक माह तक चलने वाले ‘चंबल टूरिज्म’ कैम्प पर 31 जनवरी से लोग पहुंच कर तमाम नई जानकारियों से लैस हो रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि चंबल के दिन भी अब बहुरेंगे।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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