भारत में नहीं जन्म लेगा दूसरा रवीश कुमार :- सैय्यद ज़ायर हुसैन

*भारत में नहीं जन्म लेगा दूसरा रवीश कुमार :- सैय्यद ज़ायर हुसैन* भारत देश की ज़मीन पर जन्मे रवीश कुमार का जन्म 5 दिसम्बर 1974 में बिहार के मोतिहारी में हुआ। जिन्होंने लोयोला हाई स्कूल पटना से अपनी शिक्षा हासिल की है। और उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि हासिल करने के बाद उन्होंने भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता में स्नातकोतर डिप्लोमा हासिल किया। जिन्हे पत्रकारिता में अपनी एक अलग ही पहचान बनाई और उनको पुरुस्कार से नवाज़ा गया – हिंदी पत्रिका रंग में गणेश शंकर विद्यार्थी पुरुस्कार (2010,2014) में मिला। पत्रिका रंग में रामनाथ गोयंका पुरुस्कार 2013 में मिला। इंडियन टेलीवीज़न उत्तम हिंदी पुरुस्कार मिला। पत्रकारिता के छेत्र में (रेमन मैगसेसे पुरुस्कार अगस्त 2019) में यह कहकर दिया गया कि उन्होंने गरीबों की आवाज़ सावर्जनिक मंच पर उठाई है। *रवीश कुमार ने कुल पांच 5 किताबें लिखी:-* 1- इश्क में शहर होना। 2- देखते रहिये। 3- रवीशपन्ति। 4- द फ्री वाइस: आन डेमोक्रेसी, कल्चर एंड दा नेशन। 5- बोलना ही है: लोकतंत्र, संस्कृति और राष्ट्रीय के बारे में। इनकी यह पांच किताबें बहुत फेमस हुई है, और मार्किट में आई हुई है, जो कोई भी खरीद सकता है, और ऑनलाइन भी खरीद सकता है। (बोलना ही हैं) मैने ख़ुद लेकर पढ़ी और मुझे बहुत पसंद आयी, जिसके लिए तारीफ लफ़्ज़ भी कम पड़ जाये, बहुत सुंदर किताब हैं। NDTV के वरिष्ठ पत्रकार और सम्पादक रवीश कुमार आज अपनी पत्रकारिता से भारत देश में ही नहीं पुरे विश्व में जाने जाने जाते हैं और माने जाते हैं उनकी ईमानदारी, सच्चाई, और सज्जनता के कारण आज उनको पूरा देश दीवानगी की तरह चाहता है क्यूंकि रवीश कुमार उन पत्रकारों में से है जो सामाजिक, ग़रीबी, मुज़दूरों, बेसहाराओ, बेरोज़गारो, बेशिक्षकों, ज़ुल्म से पीड़ित लोगो की आवाज़ को अपनी आवाज़ मिलाकर NDTV PRIME TIME में उठाते है और उठाते आये है। जिस तरह से सन 2014 से लेकर 2020 की गोदी मिडिया ने अपनी पत्रकारिता को अंजाम दिया वो बेहद दर्दनाक है, जिसकी कोई निन्दा नहीं कर सकता, एक तरिके से लोकतंत्र को ख़त्म करने में लगी हुई है, जनता की आवाज़ को ख़त्म करना और उनके जीवन के मुद्दे को ख़त्म करना और उनसे चिल्ला चिल्लाकर बात करना पक्ष का खुलेआम सप्पोर्ट करना यह पत्रकारिता को ख़त्म करने जैसा है। रवीश कुमार ने जब जनता के असली मुद्दों पर रौशनी डाली और उनके बीच में जाकर उनका हाल देखा और मालूम किया देश में उनके साथ क्या हो रहा है कैसे जी रहे है, रवीश कुमार ने अपना दर्द भुलाकर गरीबों का दर्द ख़ुद का दर्द समझ लिया और देश में जो हो रहा है उन सबका बयान किया सत्ता से सवाल करने पर उनको एंटी बीजेपी कहाँ गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और डटे रहे अपनी ईमानदारी-सज्जनता से पत्रकारिता करते रहे। मै जानता हूं एक पत्रकार के लिए यह पत्रकारिता का काम कितना मुश्किल और समस्याओ से भरा हुआ है फ़ोन कॉलस पर धमकी भरे मैसेज और गालियो की बौछार ईमेल के ज़रिये गलियों और ग़लत भाषा का प्रयोग कर भेजा जाता है, जिसकी कोई तुलना भी नहीं की जा सकती, क्या एक पत्रकार को जो सच्चाई दिखाने और छापने के लिए उसके साथ ऐसा सब कुछ किया जाता है। सरकारे भी कुछ नहीं करती और नाही कुछ बोलती, सरकार की आलोचना करना यह कहाँ का ग़लत लिखा हुआ है, पत्रकारिता का मतलब ही यही है, सरकार से सवाल पूछना और जवाब मिलने पर उसको टीवी और समाचार पत्र में छापना ताकी जनता तक पहुंचे, लेकिन इस युग में ऐसा नहीं है जो रवीश कुमार के साथ होता है उनको सरकार से सवाल करने पर गालिया, धमकी, ग़लत टिप्पणी की जाती है यहां तक की उनको एंटी बीजेपी भी कहाँ जाता है और कहाँ जा रहा है। रवीश कुमार ने जो देश के अंदर लोगो के दिलो में अपनी जगह बनाई है, मोहब्बत क़ायम की है, उसको सरकारे तो क्या कोई भी आने वाले भविष्य में ख़त्म नहीं कर सकता, यह ख़ुद में एक सच्चाई है, जो छुप तो सकती है लेकिन कभी मर नहीं सकती। रवीश कुमार ने अपने 9:00 बजे के प्राइम टाइम शो में आज से पहले कुछ बोला था एक मैसेज दिया था और यह बोला था, इस गोदी मिडिया ने लोगो के दिमाग़ को ख़राब करके रख दिया, अब इस जाल से या इस कुए से कोई नहीं निकल सकता जो आपके लिए एक बहुत बड़ा जाल बुना गया है। आप टीवी देखना बंद कर दीजिये, अगर इस माया जाल से बचना हो तो वरना आप एक ऐसी दलदल में फ़स जायेंगे और फसते चले जायेंगे आपको पता भी नहीं चलेगा, की हम किस दलदल में फ़स चुके हैं और किस जगह आ गए और किस मोड़ पर आ खड़े हुए, रवीश कुमार की बाते दिलो को ऐसी छू गईं जैसे किसी ने तीर मारा हो और दिल में जा लगा हो, रवीश कुमार की पत्रकारिता में किसी भी तरह का जात-पात, भेदभाव, हिंदु-मुस्लिम वाली कोई भावना ऐसी नहीं हैं, सिर्फ और सिर्फ एक सच्ची पत्रकारिता जो प्राइम टाइम के ज़रिये सादगी से करते हैं, रवीश कुमार का कहना था- हमारे दिलो में प्यार की जगह सिर्फ दूसरे के लिए नफ़रत ही रह जाएगी और यही बचेगी, प्यार ख़त्म हो जाएगा, समझ लेना देश का लोकतंत्र ख़त्म हो चूका है, जब आपकी बात कोई गोदी मिडिया नहीं सुनेगा, आपकी फरयाद को कोई ध्यान नहीं देगा, आप ख़ुद को अकेला महसूस करेंगे, आपके आस-पास कोई नहीं रहेगा, और कुछ नहीं बचेगा, आप टीवी देखना बंद कर दीजियेगा, बार बार यह बात कहना और प्यार से समझाना यह कोई छोटी बात नहीं होती अपने आप में एक बहुत बड़ी बात होती हैं जो आज तक किसी पत्रकार ने नहीं कहीं और नाही बोली, एक टीवी एंकर आपको समझा रहा है तो इसका मतलब है, उसके दिल में आपके लिए और देश के लिए बेहद प्यार और मोहब्बत है। लेकिन यह बात आपको समझनी चाहिए, फैसला हमें ख़ुद करना होता है, दूसरे नहीं करते दूसरे सिर्फ हमें गुमराह करते है, हमारे दिमाग़ो को ज़हर से भरने का काम करते है। जहाँ तक मेरा अनुभव हैं मेरा ज्ञान हैं इस हिंदुस्तान में रवीश कुमार जैसा कोई पत्रकार दुबारा जन्म नहीं लेगा, मिल जाये तो रवीश कुमार जैसा ना होगा, जैसे रवीश कुमार है और यह अपने आप में एक सत्य है, जिस तरह से देश को बचाने का और जनता को बचाने का काम किया हैं, यह अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है। मै नहीं समझ सकता के दूसरा भी कोई पत्रकार ऐसा जन्म लेगा या आएगा। प्राइम टाइम में रवीश कुमार की यह सारी बाते मेने ख़ुद सुनी और देखी अमल भी किया हैं, काफ़ी कुछ सिखने को मिला और समझने को मिला, इंसान सब कुछ एक माँ के पेट से नहीं सीखता बाहर आकर ही सीखता है, फिर चाहे उसे कैसा इंसान मिले सिखाने को इंसान के ख़ुद के हाथो में होता है, उसे कैसा इंसान चाहिए जिससे वो सारी सही बाते सीख सके और उसको एक गुरु के रूप में स्वीकार कर सके, मै भी एक समाचार पत्र का पत्रकार हूं, और एक सम्पादक हूं, जो केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता प्राप्त हूं, मैंने भी रवीश कुमार से बहुत कुछ सीखा और सिखने को मिल रहा है, जिस तरह से यह पत्रकारिता करते हैं, और यह मेरे लिए कोई शर्म की बात नहीं है बल्कि में इसको अपना खुशकिस्मत समझता हूं के रवीश कुमार जैसे इंसान मुझे मिले, पत्रकारिता अपनी जगह होती है और सिखने के लिए कोई उमर नहीं देखी जाती, ओहदा नहीं देखा जाता, आदमी छोटा हो या बड़ा यह भी नहीं देखा जाता, बस उसकी खूबियां,अच्छाईया, बोलने का तरीक़ा, चालचलन कैसा हो, यह सब मायने रखता है, और में ख़ुद को क़िस्मत वाला ही समझता हूं, उनका साथ पाकर चाहे जैसा भी, अगर ख़ुदा ने मुझे ज़िन्दगी बख्शी तो एक दिन ज़रूर मिलना होगा, बात करने के अलावा, इसका भी में शुक्र अदा करता हूं उस मालिक का जिसने पूरी क़ायनात बनाई, मै सैय्यद ज़ायर हुसैन ख़ुदा से यही दुआ करता हूं, रवीश कुमार के लिए कि हमेशा ख़ुदा उनको लम्बी उम्र दे, सेहत दे, हर मुश्किल उनसे दूर रहे उनका परिवार हमेशा खुश रहे, सुखी रहे और कामयाबी की हर बुलंदी को पार करें मुझमे और जनता में उनके प्रति जो प्यार और स्नेह है वो हमेशा क़ायम रहे, कभी ख़त्म ना हो सके इसी प्राथना ख़ुदा से करता हूं। *पत्रकारिता क्या है:-* सबसे पहले आपको बता दिया जाये पत्रकारिता युग में जब भारत में पहला समाचार पत्र 29 जनवरी 1780 में जैम्स आगस्टस हिकी ने निकाला था, हिकी कम्पनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिग्स के ज़बरदस्त आलोचक थे, सो हास्टिंग्स ने काफी केस मुकदमे उन पर दायर कर दिए थे,और उन्हें भारत छोड़ जाना पड़ा, उनके साथ बहुत सारी मुसीबत और परेशानिया आई और सामना किया लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। पत्रकारिता अपने समाज में फैली बुराइयों को टीवी व समाचार पत्र के ज़रिये शासन, प्रशासन तक पहुंचाने का काम करता हैं, जिसको कलम का सुपाही भी कहते हैं, जो किसी के आगे झुकता ना हो और अपनी कलम का सही प्रयोग करें बिना किसी चाटुकारिता के उसको ही पत्रकारिता कहते हैं, और सच्ची पत्रकारिता कहते हैं, और इस पत्रकारिता को देश के निडर और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने पत्रकारिता कर ख़ुद को साबित करके भी दिखाया हैं, ऐसे पत्रकारों से हमें ही नहीं बल्कि सभी पत्रकारों को और आम जनता को भी सीख लेनी चाहिए, बिना किसी शर्म और हिजकिचाहट के सीखना चाहिए। आज पत्रकारिता युग का अस्तर इतना गिर चूका है जिसकी तुलना आने वाले भविष्य में भी नहीं की जा सकती, जिस तरह से सत्ता के पक्ष में पत्रकारिता हो रही हैं। सरकार से सवाल ना पूछ करके विपक्ष से सवाल पूछे जा रहे हैं, देश में बढ़ती बेरोज़गारी, बढ़ती अर्थव्यवस्था, शिक्षा का खात्मा होना, हिन्दू-मुस्लिम डिबेट में TRP को बढ़ाना, जानता को कुचलना और उनके अधिकार को मार गिराना यह सब इस युग की गोदी मिडिया ने बखूबी अंजाम दिया हैं और इसका ज़िम्मेदार सिर्फ एक हैं और कोई नहीं हैं वो कहते हैं ना समझदार को इशारा ही काफ़ी होता हैं। आने वाला समय भारत की गोदी मिडिया के लिए बहुत खतरनाक साबित होगा और इस देश के लिए जिसने कभी सोचा भी नहीं होगा आज मुझे कहते हुए बहुत हो रहा हैं भारत की मिडिया का हाल क्या से क्या होगा।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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