आवारा पशुओं से परेशान अन्नदाता किसान

आवारा पशुओं से परेशान अन्नदाता किसान

कई बार संबंधित अधिकारियों से की शिकायत, नहीं कोई समाधान

एटा। न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि राज्यों की सरकारें भी अन्नदाता किसानों की सहूलियत के लिए तमाम योजनाएं चला रही हैं। किसानों की हालात सुधारने के तमाम दावे तथा वादे कर रही हैं। इससे किसानों की हालात में सुधार भी हुआ है लेकिन ये सरकार के वादों के बिलकुल विपरीत हैं। इसमें किसानों की जो सबसे बड़ी समस्या है वो है आवारा पशुओं द्वारा किसानों की मेहनत से तैयार की गई फसलों की बर्बादी, जिसके कारण किसानों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। यूपी की योगी सरकार ने इन आवारा घूमते गोवंशों के लिए लगभग हर जिले में गौशालाएं भी बनाई है लेकिन इसके बाद भी आवारा पशुओं से फसलों को बचाया नहीं जा सका है। इसके जिम्मेदार वो अधिकारी हैं जिनके ऊपर इन आवारा गोवंशों को सरकार द्वारा बनाई जा रही गौशालाओं में पहुंचाने की जिम्मेदारी है. लेकिन ये अधिकारी इन गोवंशों को गौशालाओं में लेकर ही नहीं जा रहे हैं या नाममात्र के लिए ले जा रहे हैं।

आवारा पशुओं का मुद्दा चल रहा है लंबे समय से

आवारा पशुओं द्वारा फसलों के नुकसान का मुद्दा किसानों द्वारा लंबे समय से उठाया जा रहा है। आवारा पशुओं द्वारा किसान की लहलहाती फसल को नुकसान पहुंचा रहा है। किसान जिस फसल को तैयार करने के लिए न दिन देखता है, न रात देखता है, जी-तोड़ मेहनत करता है. उसे उम्मीद रहती है कि इसी फसल से उसको पैसा मिलेगा जिससे उसके घर का खर्चा चलेगा, बच्चों की पढ़ाई की फीस जायेगी, बेटी की शादी के लिए भी पैसा जमा करेगा. लेकिन जब उसी फसल को आवारा पशु नष्ट करते हैं तो किसान परिवार पर क्या बीतती होगी।

एटा जनपद के अलीगंज क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में निवास कर रहे किसानों का कहना है कि आवारा पशु रात दिन खेतों में उनकी फसलों को बर्बाद करते रहते हैं। कई बार तो टॉर्च लेकर उनके पीछे भागना पड़ता है। वही अलीगंज क्षेत्र के आगोनापुर, किनोली, बझेड़ा, अमरोली रतनपुर, पुराहार, नगला बल्लभ, दिवाईया, नगला सियार सहित अन्य ग्रामीण इलाकों में भी आवारा पशुओं का आतंक जोरों पर है। किसान ने बताया कि गेंहू और तम्बाकू की फसल बोई है, लेकिन आवारा पशु उसे खराब कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि भाजपा सरकार खेती में तकनीक के प्रयोग से आय दोगुनी करने की बात करती है, लेकिन आय दोगुनी कैसे होगी? यदि फसल अच्छी हो भी जाए तो इन आवारा पशुओं का क्या करें। किसान को तो दोहरी मार सहनी पड़ती है कभी मौसम और कभी आ आवारा पशुओं की। आवारा पशु किसानों की मेहनत पर पानी फेरने को उतारू हैं। जिससे किसानों को अपनी फसल बचाने के लाले हैं। हालात ये हैं कि रात-रात जागने के बावजूद उनके खेतों में खड़ी गेहूं की फसलें ये जानवर साफ कर रहे हैं।
आवारा पशु लगातार किसान की लागत और मेहनत दोनों को बर्बाद कर रहे हैं। सरकार ने भले ही आवारा पशुओं को गौशाला में डालने का फरमान सुना दिया हो लेकिन अलीगंज क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में आसपास आज भी आवारा पशुओं के झुंड किसानों की खेती बर्बाद करते नजर आ जाएंगे। समाचार पत्रों में खबरे छपती हैं और सरकार सम्बंधित अधिकारियों को कड़ा निर्देश देती है लेकिन कुछ दिन बाद स्थिति जस की तस हो जाती है। आवारा पशुओं को क्षेत्रीय लोग अपने यहां से भगाकर अन्यत्र कहीं दूर कर देते हैं और वहां जाकर वहां के किसानों की खेती बर्बाद करने में लग जाते हैं। कई किसानों को तो यह भी नहीं पता कि हम इस समस्या की शिकायत किसके पास करें। हालांकि कुछ जागरूक किसान क्षेत्र के सम्बधिंत अधिकारियों को भी फोन लगाकर समस्या से अवगत करा देते हैं लेकिन उस शिकायत का कोई सार्थक परिणाम नही निकलता और नतीजा फिर वही “ढाक के तीन पात” जैसा ही है।

क्या कहते हैं ग्रामीण

अलीगंज के कुदेशा निवासी पन्नालाल का कहना है कि हम किसान फसलों को बड़ी ही मेहनत के साथ सींचते है। लेकिन आवारा घूम रहे पशुओं ने तो उत्पात मचा रखा है। आखिर इन आवारा पशुओं से कब तक निजात मिलेगी क्या यूं ही किसान आवारा पशुओं के प्रकोप से आत्महत्या करने को मजबूर रहेगा।

श्रीपाल शक्य अगोनापुर निवासी का कहना है कि हम फसल को तैयार करने में ना दिन देखते हैं और ना रात परंतु इन आवारा गोवंश द्वारा फसल को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। कई बार तो टॉर्च लेकर आवारा घूम रहे पशुओं के पीछे भागना पड़ता है जिसके चलते कई बार तो किसान भाई चुटैल हो जाते हैं।

अलीगंज क्षेत्र के अगोनापुर निवासी सुमित शाक्य का कहना है कि हम तो किसान हमेशा परेशानी में ही रहते हुए आए हैं कभी मौसम की मार तो कभी आवारा पशुओं की। कई बार तो संबंधित अधिकारियों से शिकायत भी की गई लेकिन समस्या का कोई समाधान नहीं मिला।

अलीगंज क्षेत्र के निवासी पचन्दा दिनेश यादव का कहना है कि इन नीलगाय ने हम किसानों को परेशान कर रखा है खेतों में घुसकर के फसलों को बर्बाद करते हैं।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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