उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल — डा. रक्षपाल सिंह

उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल — डा. रक्षपाल सिंह

अलीगढ़। प्रख्यात शिक्षाविद और डा. बी. आर. अम्बेडकर विश्व विद्यालय आगरा शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष डा. रक्षपाल सिंह ने उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के सवाल पर प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री को भेजे पत्र में नई शिक्षा नीति-2020 के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने की संभावनाओं पर तत्काल कार्यवाही करने का अनुरोध किया है। उन्होंने पत्र में स्पष्ट किया है कि सामान्य तौर पर उत्तर प्रदेश के लगभग 22 करोड़ लोगों को आर्थिक सामाजिक आधार पर मोटे तौर पर तीन वर्गों यथा अमीर वर्ग,मध्यम वर्ग एवं गरीब वर्ग में बांटा जा सकता है और इन वर्गों के बच्चों के पठन पाठन की स्थिति पर नज़र डाली जाये तो निम्न स्थिति बनती है:1-अमीर वर्ग -इस संपन्न वर्ग के बच्चों के अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक होने के कारण अपने बच्चों को सीबीएसई/आईसीएसई से सम्बद्ध महंगे इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाते हैं। अपने बच्चों को स्कूल भेजने,वहां से लाने तथा उनका होम वर्क कराने की जिम्मेदारी स्वयं वहन करते हैं। इस वर्ग में प्रदेश के लगभग 15% लोगों को रखा जा सकता है।2- मध्यम वर्ग- इस वर्ग के लोग अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक तो होते हैं, लेकिन अपनी सामान्य आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें महंगे इंगलिश मीडियम स्कूलों में तो नहीं पढा सकते, लेकिन वे अपने बच्चों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार निजी परिषदीय हिन्दी अथवा इंगलिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाते हैं और बच्चों के साथ स्वयं परिश्रम करके उनका पूरा सहयोग करते हैं। समाज के लगभग 20% लोग इस वर्ग में आ सकते हैं।
3-आर्थिक तौर पर कमजोर समाज के शेष लगभग 65% लोग ऐसे हैं जो सरकारी स्कूलों में पढते हैं, जिनमें से अधिकांश बच्चों के अभिवावक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं होते एवं जो जागरूक होते भी हैं तो उनके पास अपने बच्चों को परिषदीय निजी स्कूलों में भी पढ़ाने की क्षमता नहीं होती। इनमें से 75% से अधिक बच्चे केवल मिड डे मील तथा स्कूलों से मिलने वाली सुविधाओं को प्राप्त करने के लिये ही स्कूल आते हैं। यही कारण है कि ऐसे स्कूलों के कक्षा 5 के लगभग 50% बच्चे एवं कक्षा 8 के लगभग 25 % बच्चे कक्षा 2 की किताब भी नहीं पढ़ पाते,जबकि सीबीएसई से सम्बद्ध कक्षा 2 के बच्चे समाचार पत्र तक पढ़ लेते हैं । बेसिक शिक्षा की इस बदहाली के लिये शिक्षा का अधिकार कानून 2009 काफी हद तक जिम्मेदार है ,जिसके तहत बच्चों को किसी कक्षा में फ़ेल नहीं किया जा सकता, चाहे बच्चे कुछ भी न जानते हों ।उक्त बदहाल स्थिति सीबीएसई व परिषदीय स्कूलो में नहीं होती क्योंकि वहां बच्चों की प्रति दिन लगभग शत प्रतिशत उपस्थिति रहती है और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई भी होती है।

यहां उल्लेखनीय यह भी है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक अधिकांश सीबीएसई स्कूलों से अधिक योग्य होते हैं ,लेकिन जब सरकारी स्कूलों के बच्चे बिना कुछ जाने बेसिक कक्षाओं में प्रमोट हो जाते हैं तो बच्चों को मिली ये सहूलियत बच्चों में शिक्षा के प्रति दिलचस्पी पैदा करने के बजाय उनकी पढ़ाई में बाधा बन जाती है और अभिवावक भी उनके बच्चों के आगे की कक्षाओं में पहुंचते रहने से निश्चिंत हो जाते हैं। इस विषम स्थिति में शिक्षक वर्ग में भी जैसी तेरी कौमरी वैसे ही मेरे गीत वाली कहावत को ही चरितार्थ करते हुए अपने शिक्षण कार्य के प्रति दिलचस्पी नहीं रहती ,जिसकी शिक्षा प्राप्ति हेतु बेहद ज़रूरत होती है ।

असल में वस्तुस्थिति यह है कि सरकारी स्कूलों में सभी कक्षाओं की वार्षिक परीक्षाओं की मात्र रस्म अदायगी ही होती है क्योकि इन परीक्षाओं से पास-फ़ेल का आंकलन होता ही नहीं जबकि सीबीएसई से सम्बद्ध स्कूलों में एल के जी,यू के जी से लेकर आगे की सभी कक्षाओं की परीक्षाओं को बहुत गम्भीरता से लिया जाता है और यही कारण है कि वहां के सभी विद्यार्थी गुणवत्तापरक शिक्षा प्राप्त करने में कामयाब रहते हैं।इस बारे में हकीकत किसी से छिपी हुई नहीं है कि जिन बच्चों की बेसिक शिक्षा गुणवत्तापरक हो जाती है ,वे ही गुणवत्तापरक माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं। उक्त तथ्यों के मद्देनज़र स्थिति यह बन गई है कि गरीब वर्ग के अपवादस्वरूप बच्चे ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षण संस्थानों में पहुंच पाते हैं। जबकि निजी परिषदीय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अपने अभिभावकों एवं अपने सतत परिश्रम की बदौलत 50 % से अधिक बच्चे अच्छी बेसिक व माध्यमिक शिक्षा प्राप्त कर अधिकांश मध्यम स्तर तथा शेष अच्छे स्तर के उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पा जाते हैं। जहाँ तक सीबीएसई से सम्बद्ध स्कूलों और राज्य बोर्डोँ के कतिपय गुणवत्तापरक स्कूलों की बात है तो इन स्कूलों के विद्यार्थियों को केन्द्रीय विश्विद्यालयों, केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों ,आईआईटीज़,एनआईटी,राज्य विश्विद्यालयों के आवासीय परिसर, विदेशी विश्विद्यालयों और कतिपय निजी महंगे विश्विद्यालयों में अध्ययन करके गुणवत्तापरक शिक्षा प्राप्त करते हैं।शेष मध्यम स्तर की शिक्षा प्रदान करने वाले देश के अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अपनी शिक्षा ग्रहण करते हैं। रही बात गरीब वर्ग के लगभग 60 % एवं मध्यम वर्ग के पढ़ने में कमजोर शेष 50 % विद्यार्थियों की तो वे देश में कुकुरमुत्तों की तरह उगे स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों में अपना प्रवेश लेते हैं जहाँ यदा कदा ही जाना पड़ता है और इन संस्थानों के प्रबंधकों की कृपा से अच्छे अंकों की अंकतालिकायें प्राप्त हो जाती हैं जिन्हें न भाषा की समझ होती है और न अन्य विषयों की । परिणाम यह होता है कि इंग्लिश मीडियम से शिक्षा पूरी करने वाले लोग हिन्दी मीडियम वालों को मात दे देते हैं। अपनी मातृ भाषा हिन्दी की यूपी में स्थिति यह है कि गत यूपी बोर्ड की परीक्षाओं में शामिल 56 लाख परीक्षार्थियों में से लगभग 8 लाख हिन्दी में फ़ेल हुए और 2•5 लाख हिन्दी की परीक्षा ही छोड़ बैठे।

उल्लेखनीय यह भी है कि यदि यूपी के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने मौडरेशन पोलिसी न अपनाई होती तो हिन्दी में फ़ेल होने वालों की संख्या 2 से 3 गुनी ही होती।हिन्दी मीडियम स्कूलों में हिन्दी भाषा की बदहाली अन्य विषयों को भी प्रभावित करती ही है जिसकी वज़ह से इंग्लिश मीडियम स्कूलों के विद्यार्थियों से शिक्षा के क्षेत्र में ये सरकारी स्कूल मुकाबला करने में नाकाम रहते हैं ।
बेसिक शिक्षा की मज़बूती हेतु नई शिक्षा नीति -2020 में सरकारी बेसिक शिक्षा को भी सीबीएसई पैटर्न पर संचालित करने हेतु 3 वर्ष के बच्चों को E CC E के माध्यम से शिक्षा देने की घोषणा की है जो समझ से परे है कि जो सरकारें अभी तक 6 साल के बच्चों की निरंतरता के साथ 50 % उपस्थिति भी स्कूलों में दर्ज़ नहीं करा पाई,अब 3 साल के बच्चों को कैसे स्कूलों में प्रतिदिन ला पायेंगी ? क्या वहां सीबीएसई स्कूलों की तरह ही 3-4 साल के बच्चों की देखभाल हो सकेगी ? बच्चों का होम वर्क कौन कराएगा? जब वर्तमान में स्कूलों में पठन पाठन और उनकी उचित देखभाल नहीं हो पा रही है तो नई शिक्षा नीति के तहत कौन सी जादू की छड़ी मिल जाएगी जिसे घुमाने से सरकारी स्कूलों के बच्चों में पढ़ाई के प्रति गम्भीरता जाग उठेगी एवं उनके अभिवावक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूकता पैदा हो जाएगी ? सरकारी स्कूलों की 21वीं सदी के विगत लगभग 20 वर्षों की कार्यशैली एवं शिक्षा क्षेत्र में उनकी कारागुजारियों को दृष्टिगत रखते हुए तो उक्त प्रश्नों के उत्तर नकारात्मता की ओर ही इशारा करते हैं।
डा. सिंह ने कहा है कि नई शिक्षा नीति-2020 सिद्धांतत: तो अच्छी है, लेकिन उसका क्रियान्वयन बहुत आसान नहीं लगता। सरकारी स्कूलों में इसके क्रियान्वयन हेतु सरकार की ओर से सभी अभिवावकों को उनके बच्चों की शिक्षा के प्रति निरन्तर जागरूक किये जाने हेतु सक्रिय अभियान चलाये जाने ,बच्चों की प्रत्येक कक्षा की नकलविहीन परीक्षाएं कराकर उनका पारदर्शी मूल्यांकन कराये जाने , 33% से कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को प्रमोट न किये जाने अर्थात शिक्षा के अधिकार कानून -2009 में निहित सभी को आगे की कक्षाओं में प्रमोट किये जाने के प्रावधान को समाप्त किये जाने, कक्षाओं में सभी विद्यार्थियों की निरन्तर उपस्थिति सुनिश्चित किये जाने एवं बच्चों का पाठ्यक्रम पूरा कराने के साथ ही उनका होम वर्क कराये जाने आदि की व्यवस्थाएं बनाये जाने से ही नई शिक्षा नीति-2020 देश के नौनिहालों/नौजवानों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान किये जाने की ओर अग्रसर हो सकती है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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