
हमेशा शांत रहने वाला हिमालय आज अनेकानेक समस्याओं से जूझ रहा है। लगातार वर्षा, बादल फटने, बाढ़, भूस्खलन और भूधंसाव जैसी आपदायें जहां तबाही का सबब बन रही हैं, वहीं बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन ने इसमें और अहम भूमिका निबाही है। दरअसल हर साल आने वाली तबाही से हिमालयी राज्यों का बुनियादी ढांचा जिस तरह तहस-नहस होता है, उसकी भरपायी लाख कोशिशों के बाबजूद कभी नहीं हो पाती।
क्योंकि जिस रफ्तार से राहत कार्यों को अंजाम दिया जाता है और ध्वस्त हो चुके बुनियादी ढांचे को फिर खडा़ करने का प्रयास किया जाता है, उसके पूरे होने से पहले फिर ये आपदायें इन राज्यों को अपनी चपेट में ले लेती हैं और तबाही का मंजर और विकराल रूप अख्तियार कर लेता है। इसके चलते आपदाओं से ढहा बुनियादी ढांचा कभी अपने पहले स्वरूप में आ ही नहीं पाता। यह किसी एक साल की बात नहीं है बल्कि यह तो हिमालयी राज्यों की नियति बन चुकी है। हां इतना सच है कि इसमें साल दर साल इजाफा जरूर हो रहा है जो चिंता की असली वजह है कि यदि अब भी नहीं चेते तो देश का भाल कहा जाने वाला हिमालय दरक कर ढह जायेगा। उक्त विचार पर्यावरणविद व राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा समिति के अध्यक्ष ज्ञानेन्द्र रावत ने बातचीत के दौरान व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि उस दशा में भी जबकि मध्य हिमालय भूकंप की दृष्टि से ज्यादा खतरनाक है। जाहिर है समस्या बडी़ है तो सवाल यह भी है कि समाधान क्या है? ऐसी दशा में हमें विकास और नगर नियोजन की अपनी मूल सोच को परिमार्जित करना होगा। उसे सुरक्षा, स्थिरता के साथ जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रतिरोधी समाज के निर्माण के साथ इस हिमालयी क्षेत्र की मूल सांस्कृतिक, आध्यात्मिक विशिष्टता और पर्यावरणीय भावना के अनुरूप विकास का ढांचा अख्तियार करना होगा, तभी कुछ बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। इसलिए यदि अब भी हिमालय के विकास के मॉडल पर त्वरित कोई कार्यवाही नहीं हुई तो हिमालय जिस तरह से अभी दरक रहा है। उसकी दर में आने वाले दिनों में और बढो़तरी होगी और हिमालय की पुकार के अनसुना करने के भविष्य में और घातक परिणाम होंगे। इसमें दो राय नहीं।