*सेंगोल भारत के सनातन परंपरा एवं भारत के आजादी का प्रतीक एवं चाणक्य चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर मानववादी सनातनी बौद्ध परंपरा का निर्वहन करने वाले सम्राट अशोक के कुशल शासन एवं मानव कल्याण का पवित्र प्रतीक*– एके बिंदुसार संस्थापक भारतीय मीडिया फाउंडेशन।

सेंगोल प्रकरण पर उठे सवाल को लेकर भारतीय मीडिया फाउंडेशन की ओर से संस्थापक एके बिंदुसार ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शक्ति और समृद्धि का प्रतीक सेंगोल एक अनोखे प्रकार का राजदंड है जिसे सत्ता के हस्तांतरण के दौरान प्रदान किया जाता है। इसका इतिहास मौर्य साम्राज्य के समय का है इंसानियत मानवता एवं भाईचारा एवं प्रजा की रक्षा करना एवं उनके साथ न्याय करने के लिए सस्ता हस्तांतरण होने पर शासक को दिया जाता था यह प्रतीक का जो महत्व है वह यह है कि अगर प्रजा के साथ राजा अन्याय करता है तो वह भी दंड का अधिकारी है राजा भी दंडित किया जा सकता है , यह परंपरा धीरे-धीरे आगे चली चोल साम्राज्य के शासन के दौरान इसे अधिक प्रमुखता मिली। यह सेंगोल की मनोरम कहानी पर प्रकाश डालता है, इसके महत्व पर प्रकाश डालता है और इसके अस्तित्व के सात संवाद प्रमाण प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि सभी धर्म गुरुओं का आदर और सम्मान किया जाना भी आवश्यक हैं
उन्होंने कहा कि सेंगोल राजतंत्र का प्रतीक है तो सम्राट अशोक स्तंभ स्वतंत्र भारतीय लोकतंत्र का पवित्र प्रतीक हैं इसलिए राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ को प्राथमिकता के आधार पर स्थापित किया जाना चाहिए नए संसद में इस पर देश के माननीय प्रधानमंत्री महोदय को विचार करके ही कदम उठाना चाहिए था विश्वास है कि आगे अवश्य सुधार किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि विश्व में जितने भी धर्म एवं पंथ चल रहे हैं वह सभी सनातन धर्म से निकले हुए हैं सनातन से निकले हुए लोगों ने ही धर्मगुरु बन कर अलग-अलग अपने धर्म एवं पंथों का निर्माण किया है यह विश्व की प्राचीन इतिहास का जीता जागता प्रमाण है।
सनातन धर्म ही मानव धर्म है एवं अखंड भारत तथा वर्तमान भारत का राष्ट्रीय राज धर्म सनातन धर्म ही है।
इसलिए किसी को सेंगोल को स्थापित करने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए इसके साथ साथ सम्राट अशोक स्तंभ के अस्तित्व को भी नहीं मिटाया जा सकता नए संसद में भारतीय राष्ट्रीय चिन्ह सम्राट अशोक स्तंभ को भी महत्व देना परम आवश्यक है और कानूनन अनिवार्य एवं अपेक्षित है।
भारतीय राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ का अपमान सेंगोल का अपमान होगा।