
इस पनपते प्रचलन को रुकना चाहिए, पर रोकेगा कौन? सियासत के हम्माम में सब एक जैसे हैं
पिछले दिनों कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपनी एक जनसभा में प्रधानमंत्री की तुलना जहरीले सांप से कर दी। खड़गे पुराने दौर के नेता हैं। भूल का एहसास होते ही उन्होंने बिना समय गंवाए स्पष्टीकरण दे दिया, पर प्रधानमंत्री और भाजपा को मौका मिल गया था। बात शायद और तूल न पकड़ती, यदि खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे ने बाद में प्रधानमंत्री के लिए अपशब्द का प्रयोग न किया होता। भाजपा इसे भी मुद्दा बना रही है। मुझे मालूम नहीं कि मतदाता इस विवाद से कितने प्रभावित होंगे, पर लोकतंत्र की गंगा अवश्य ऐसी करतूतों से प्रदूषित होती जाती है।
हम चुनाव-दर-चुनाव इस वैचारिक प्रदूषण को सहन करने के लिए अभिशप्त हैं।
किसने, किसको, कब, क्या कहा, मैं यहां इसकी तफसील नहीं देने जा रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव-दर-चुनाव पनपता यह सिलसिला खुद को संसार का सबसे पुराना लोकतंत्र बताने वाले देश के राजनेताओं को शोभा नहीं देता। हमारे राजनेताओं को यह अवश्य सोचना चाहिए कि जय-पराजय से ज्यादा जरूरी उन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा है, जिन्हें पुरखों ने हमें सौंपा है।
यह बेवजह नहीं है कि चुनावों की घोषणा होते ही तटस्थ लोग कंपकंपाने लगते हैं। वे जानते हैं कि अगले कुछ दिन कीचड़ से महास्नान के हैं। एक शोध के अनुसार, 2024 के आम चुनाव में 17.5 करोड़ के करीब युवा वोटर मताधिकार का प्रयोग करेंगे। वे किन मुद्दों पर वोट डालेंगे? क्या हर मतदाता राजनीतिक दलों के घोषणापत्र पढ़कर उनकी ‘बैलेंस शीट’ बनाता है? सब जानते हैं कि यह संभव नहीं है। ऐसे में, नेताओं की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने काम का लेखा-जोखा लेकर जनता के समक्ष हाजिर हों, पर उनके काम, वायदों की तुलना में आधे भी नहीं होते। यही वजह है कि राजनीतिज्ञों की ज्यादातर जमात लोगों का ध्यान बांटने की कोशिश करती नजर आती है। ऐसा कर हम अपनी नई पीढ़ी को वास्तविक मुद्दों की जगह क्या भड़काऊ भावनाओं पर मतदान के लिए प्रेरित नहीं कर रहे? इस पनपते प्रचलन को रुकना चाहिए, पर रोकेगा कौन? सियासत के हम्माम में सब एक जैसे हैं।
किसने, किसको, कब, क्या कहा, मैं यहां इसकी तफसील नहीं देने जा रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव-दर-चुनाव पनपता यह सिलसिला खुद को संसार का सबसे पुराना लोकतंत्र बताने वाले देश के राजनेताओं को शोभा नहीं देता।
हमारे राजनेताओं को यह अवश्य सोचना चाहिए कि जय-पराजय से ज्यादा जरूरी उन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा है, जिन्हें पुरखों ने हमें सौंपा है।