
एटा :- हमारे देश में जब भी चुनाव आते हैं या किसी बड़े मंच से भाषण होता है, सरकारें और किसान संगठनों के नेता एक स्वर में कहते हैं—“किसानों के हित में काम किया जाएगा।” घोषणाओं में किसानों की आमदनी दोगुनी करने से लेकर, मुफ्त या सब्सिडी पर खाद-बीज देने तक की बातें होती हैं। लेकिन ज़मीन पर तस्वीर कुछ और ही है।
आज एटा और आसपास के जनपदों का किसान खाद के लिए लाइन में खड़ा है, घंटों धूप में इंतज़ार कर रहा है, और कई बार तो खाली हाथ लौटने को मजबूर हो जाता है। गोदामों में खाद के बैग तो हैं, पर वितरण व्यवस्था इतनी धीमी और उलझी हुई है कि किसान को अपनी खेती छोड़कर कई-कई दिन चक्कर काटने पड़ते हैं।
दुर्भाग्य ये है कि जो किसान देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है, वही खुद खाद के लिए संघर्ष कर रहा है। नेताओं के भाषणों में किसान “अन्नदाता” है, लेकिन व्यवहार में उसे “मांगता” बना दिया गया है। सरकार हो या किसान संगठन—सब किसान की चिंता का दावा करते हैं, मगर समस्या का स्थायी समाधान किसी के एजेंडे में नहीं दिखता।
जब तक घोषणाओं और धरातल के बीच की खाई पाटी नहीं जाती, तब तक किसान के हित की बातें सिर्फ कागज़ और मंच तक ही सीमित रहेंगी, और किसान यूं ही खाद, बीज और उचित दाम के लिए धक्के खाता रहेगा।
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