
इन सेकुलर वालों की बुद्धि क्या एकदम ही भ्रष्ट हो गई है। बताइए‚ सर्वेक्षण कराने तक में आपत्ति कर रहे हैं। बनारस और अयोध्या की मस्जिदों के सर्वे पर पहले ही कांय–कांय कर रहे थे। संभल की शाही मस्जिद के सर्वे पर हाय–हाय करने लगे। और अब अजमेर की दरगाह की जांच की जरा सी अर्जी क्या अदालत ने मंजूर की‚ लगे इसे सर्वनाश का रास्ता बताने। सर्वे तो ज्ञान की सीढ़ी है। बनते हैं बुद्धिजीवी और काम ज्ञान के विरोधियों का।
और ये लोग हर वक्त धार्मिक स्थल कानून की क्या दुहाई देते रहते हैंॽ ये क्या देश की सबसे बड़ी अदालत से ज्यादा कानून जानते हैंॽ चंद्रचूड़ जी ने आते–आते ही बता दिया था कि यह कानून सर्वे यानी ज्ञान का रास्ता नहीं रोकता है। धार्मिक स्थलों का सर्वे होगा, तभी तो लोगों को इसका ज्ञान प्राप्त होगा कि दूसरों के धार्मिक स्थलों पर कहां–कहां अपना दावा पेश कर सकते हैं।
अब ज्ञान से विवाद होता हो तो हो‚ विवाद के डर से ज्ञान की यात्रा थोड़े ही रोक सकते हैं। और किसी कानून–वानून के रोकने से तो हर्गिज नहीं। ज्ञान की खोज ऐसी दीवारों से न कभी रुकी है और न रुक सकती है। ज्ञान तो पानी की तरह है‚ रोकने की कितनी भी कोशिश करो‚ पानी अपना रास्ता बना ही लेता है। जरूरत हुई तो सरकार के बाद‚ अदालतों का दिमाग भी फिरा देगा‚ पर ज्ञान अपना रास्ता बना लेगा। रही बात ऐसे सर्वे के फायदे की, तो जिसे ज्ञान की प्यास होती है‚ वह इससे नफा–नुकसान नहीं देखता है।
नफा–नुकसान देखते तो क्या ओपनहाइमर जी एटम बम बना पातेॽ अगले ने नुकसान की सोची भी तो, बम बनाने के बाद! जरूरी हुआ तो विष्णु शंकर जैन नुकसान की भी सोच लेंगे‚ पर पहले इसका ज्ञान तो प्राप्त कर लें कि किस–किस मस्जिद पर हिंदुओं की तरफ से दावा कर सकते हैं।
और ये जो जमीन के ऊपर के सर्वे पर ही इतनी हाय–हाय कर रहे हैं‚ तब क्या करेंगे जब जमीन के अंदर सर्वे होगा यानी खुदाई होगी। जरूर ये देश के गड्ढे में जाने का रोना रोएंगे। पर देश गड्ढे में नहीं जा रहा होगा‚ देश आगे बढ़ रहा होगा। न सही आगे की ओर‚ न सही आकाश की ओर‚ पाताल की ओर ही सही‚ पर देश आगे बढ़ रहा होगा। सो खोद भाई खोद।
— राजेंद्र शर्मा
(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)