
#स्वतंत्र पुलिस है या अपराध–
एटा तो सस्ती फीलिंग्स बाला शहर है यहां की मूँक बधिर पब्लिक तो सस्ती लौलीपौप से ही बहल जाती है सर्मनाक जब अनगिनत जिलों के प्रोगरेस की बात आती है तो वोट सौतेले प्रहार से खुदको चुटेल महसूस करता है तब क्या भाजपा क्या सपा, और अदरवाइज सरकारें एटा को दिया ही क्या है किसी भी सरकार ने पिछड़ा और बिगड़ा इलाका रोजगार बिहीन है तब छोटा इंसान रोटी रोजी के लिये शराब, धूम्रपान, मानव तस्करी, महिला आबरु जैसे गंदे ब्यापार मे ही अपना हित और भरणपोषण की सुविधा तलाश रहा है,अति तो तब हो गई जब तमाम बिल पास हो गये एटा की पब्लिक टीवी पर सुबह से सामतक एक आसपर टकटकी लगाए बैठी रही कि किसी बड़े उद्योग और ट्रेन जैसी सुविधा एटा के नशीव मे भी आजाएगी लेकिन हरबार की तरह निराशा ही हाथ लगी,
धूल फांकते शहर का अब चेहरा और हाल आपकी उपलब्धियों की गाथा सुना रहा अपराध आपकी सुरक्षा को रोज भेद रहा है कहीं महिलाओं के गले से चैन छीनकर तो हत्याओं से समाज मे भय का माहौलआपकी पहले जैसी सुरक्षा तो कतई नहीं है सड़कों से लेकर इंसान, इंसान के लहू का प्यासा हो रहा आखिर कबतक,पर सवाल यह उठता हैकि स्वतंत्र पुलिस की देखरेख मे अपराध सड़कों पर कैसे आ गया।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।