कहानी डाकू मोहर सिंह गुर्जर की जिसने बागी बनकर 400 से ज्यादा हत्याएं और 650 से ज्यादा अपहरण किए,चंबल के इतिहास का सबसे महंगा डाकू कैसे बन गया?

कहानी डाकू मोहर सिंह गुर्जर की जिसने बागी बनकर 400 से ज्यादा हत्याएं और 650 से ज्यादा अपहरण किए,चंबल के इतिहास का सबसे महंगा डाकू कैसे बन गया?

मध्यप्रदेश के भिंड जिले के बिसूली गांव का एक 22 साल का लड़का पहलवानी का बड़ा शौकीन था। साल 1956 में पहलवान बनने के सपने देखने लगा था, लेकिन गरीबी की वजह से उसका ये सपना सपना ही रह गया। थोड़ी सी जमीन थी। पिता के साथ किसानी करने लगा। इसी बीच गांव के कुछ दबंग उसकी जमीन का कुछ हिस्सा हड़प लेते हैं। लड़का पुलिस के पास जाता है, लेकिन पुलिस दबंगों का साथ देती है। वो दबंग कोई और नहीं उसके चचेरे भाई ही थे।

पुलिस के पास जाने की वजह से दबंग उस लड़के और उसके परिवार को बेइंतहा मारते हैं। गोलियां चलती हैं, उसके परिवार के कुछ लोग मारे जाते हैं। लड़के के पास कोई ऑप्शन नहीं बचता। गुस्से में आकर वह लड़का उन दबंगों में से एक को गोली मारकर उसकी हत्या कर देते है।

बच्चा जान कर किसी डाकू ने अपनी गैंग में नहीं लिया

साल 1958 में मोहर सिंह जब अपने चचेरे भाई की हत्या कर बीहड़ पहुंचा था तब उसकी उम्र 24 साल की थी। देखने में मासूम बच्चे जैसा लगता था। चंबल में उसने कई डाकुओं की गैंग में शामिल होने की कोशिश की, लेकिन कम उम्र और नौसिखिया होने की वजह से उसे किसी ने भी अपनी गैंग में नहीं लिया। यहां गांव में उसके ऊपर एक हत्या का केस दर्ज हो चुका था। पुलिस लगातार उसे ढूंढ रही थी इसलिए वो वापस भी नहीं जा सकता था।

मोहर सिंह ने अपनी ही एक गैंग बनाने का फैसला लिया। बीहड़ में कई दिन बिना खाए-पिए बिताए। फिर उसकी दोस्ती कुछ नए डाकुओं से हुई और उसने एक छोटी सी गैंग बना ली। गैंग बनाने के बाद लूट, अपहरण और हत्याओं जैसी घटनाओं को अंजाम देना शुरू कर दिया।

मोहर की गैंग का सालभर का खर्चा 80 लाख रुपए होता था

धीरे-धीरे मोहर का गैंग बड़ा होता गया। उसकी गैंग में डेढ़ सौ से ज्यादा डाकू शामिल हो चुके थे। साल 1961-62 में मोहर की गैंग का सालभर का खर्चा 1 लाख रुपए होता था। मतलब, आज के करीब 80 लाख रुपए। अपराधों के अलावा उसकी मूछों की भी चर्चा होती थी।

मोहर की बड़ी गैंग को पैसों की बहुत ज्यादा जरुरत होती थी इसलिए उसने पकड़, यानी अपहरण करना तेज कर दिया था। मोहर को जैसे ही पता चलता कि कोई थोड़ा भी अमीर या रसूखदार व्यक्ति है वो उसे उठवा लेता और फिरौती वसूलता। फिरौती ना मिलने पर उसकी बेदर्दी से हत्या कर देता। इस तरह उसने 650 से ज्यादा अपहरण और सैकड़ों हत्याएं करके ढेर सारा पैसा इकठ्ठा कर लिया।

लोगों ने रईसी दिखानी बंद कर दी थी, गरीबों जैसे रहने लगे थे

मोहर लगातार अमीरों का अपहरण और उनकी हत्याएं कर रहा था। इन वारदातों के चलते चंबल के आस-पास के जिलों के लोग दहशत में आ गए थे। MP, UP और राजस्थान के भिंड, मुरैना, इटावा, जालौन, आगरा और धौलपुर जिलों के लोगों ने अपना पैसा दिखाना और बताना दोनों बंद कर दिया था। यहां के लोग अमीर होते हुए भी मामूली जिंदगी जीने लगे थे, ताकि मोहर सिंह को कहीं से भी पता न चले कि इनके पास पैसा है।

मोहर चंबल का सबसे महंगा डाकू कहलाने लगा

जनता के बीच मोहर का इतना खौफ पैदा हो गया था कि पुलिस के साथ तीन राज्यों की सरकारों पर भी दबाव बढ़ चुका था। मोहर पर 650 अपहरण और 400 से ज्यादा हत्याओं के केस दर्ज होने के बाद पुलिस की कई टीमें बीहड़ों के चक्कर काटने लगी थीं। मोहर की गैंग से उनकी मुठभेड़ तो होती, लेकिन पकड़ नहीं पाती थीं। उल्टा पुलिस के ही दर्जनों जवान मारे जाते थे।
अब पुलिस मोहर के डर से चंबल के अंदर जाने से भी डरने लगी थी। मोहर से तंग आ कर पुलिस ने उस पर 2 लाख और उसकी गैंग पर 12 लाख रुपए का इनाम रख दिया। आज के हिसाब से मोहर पर रखी रकम 1 करोड़ और उसकी गैंग के ऊपर रखी रकम 7 करोड़ रुपए होगी। इतना इनाम आज तक किसी डाकू के ऊपर नहीं रखा गया। इसी इनामी रकम के चलते मीडिया और बीहड़ के कई डाकू मोहर को चंबल का सबसे महंगा डाकू कहने लगे थे।

बीहड़ में बैठे-बैठे दिल्ली से किडनैपिंग करवा लेता था

साल 1965 में मोहर सिंह ने अपने एक दोस्त डाकू नाथू सिंह के साथ मिलकर एक प्लानिंग की। उसने खरीदी करने के बहाने दिल्ली के बड़े मूर्ति तस्कर को प्लेन से ग्वालियर बुलाया। जैसे ही वह तस्कर चंबल आया मोहर ने उसे बंधक बना लिया। उसके बाद उससे 26 लाख की फिरौती वसूली फिर छोड़ दिया। इस घटना से दिल्ली हिल गई थी। ये वाकया खुद मोहर सिंह ने बताया था।

उस समय चंबल में 13 कुख्यात डाकुओं की गैंग थी, मोहर सबकी मीटिंग लेने लगा था

मोहर की दिलेरी और उसके अपराधों की लिस्ट देख कर चंबल के बाकी डाकू भी उससे खौफ खाने लगे थे। मोहर जो भी करता था उसूलों के साथ करता था। वो अपनी और अपने काम की इमेज को लेकर काफी कॉन्शियस रहता था।

एक दिन उसे जानकारी लगी कि बाकी डाकुओं की वजह से उसकी इमेज भी डाकुओं वाली बनती जा रही है, जबकि वो खुद को बागी कहलवाना पसंद करता था। इसी के चलते उसने उस समय चंबल में एक्टिव मलखान सिंह, नाथू सिंह की गैंग समेत कुल 13 गैंगों को बुलाया और उनके साथ बैठक की। बैठक में फैसला किया कि अब कोई किसी के घर में घुस कर लूट नहीं करेगा। हम सिर्फ पकड़, यानी अपहरण करेंगे। इसके अलावा हम किसी बहन-बेटी के साथ कभी छेड़छाड़ नहीं करेंगे। सभी डाकुओं की गैंगों ने मोहर की बात मानी भी। इसके बाद घर में घुस कर लूट होने और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ वाली वारदातें बंद हो गई थीं। पुलिस भी ये सब देख सरप्राइज्ड थी।
मोहर सिंह गरीबों की मदद भी करता था और उनकी बेटियों की शादी भी करवाता था। मोहर ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था, “पुलिस से इतनी मुठभेड़ों के बाद भी मेरी जान सिर्फ इसलिए बची क्योंकि मैं बहन-बेटियों को देवी मानता था।”

नेता आते थे, कहते थे, “दद्दा जितवा दो” मोहर सिर पे हाथ धर देता था

नेता भी लोगों के बीच मोहर के खौफ का फायदा उठाने में पीछे नहीं रहे। 60-70 के दशक में सरपंची का चुनाव लड़ने से लेकर विधायकी तक का चुनाव लड़ने वाले नेता मोहर से संपर्क साधने लगे थे। किसी तरह जुगाड़ करके मोहर तक पहुंच जाते थे।
एक टीवी इंटरव्यू में मोहर सिंह ने बताया था, “जब हम बीहड़ में थे तब कई नेता हमसे मिलने आते थे और कहते थे, ‘दद्दा हमें चुनाव जितवा दो’, हम उनके मूड़ पर हाथ धर देते थे।” जब लोगों को पता चलता था कि मोहर ने फलां नेता के सिर पर हाथ धर दिया है तो वो खौफ में आकर उसी को वोट देते थे।

डाकू दोस्त के कहने पर कर दिया सरेंडर, सरेंडर करने वाला पहला डाकू बने

साल 1972, बीहड़ में मोहर सिंह 14 साल का वक्त गुजार चुका था। उसकी उम्र 38 साल हो चुकी थी। एक दिन बैठे-बैठे उसके मन में ख्याल आया कि इतने दिनों में बद्दुआओं के अलावा उसके हाथ और क्या आया? मन से जवाब आया, “कुछ भी नहीं।” इसी बीच मोहर के सबसे खास दोस्त डाकू माधो सिंह उससे मिलने उसके अड्डे पर आए। माधो सिंह ने मोहर को सरेंडर करने की सलाह दी। मोहर दोस्त की बात मान गया।
मोहर और माधो ने पुलिस के सामने सरेंडर करने का प्रस्ताव रखा। आत्मसमर्पण की बात करने के लिए मोहर तब के बड़े राजनेता जय प्रकाश नारायण से मिला। बाकरा बांध पर मोहर की जेपी से बात हुई। फिर इंदिरा की तरफ से मेसेज आया, “आप सरेंडर कीजिए। आपको पूरा फायदा दिया जाएगा।”

14 अप्रैल, 1972 को गांधी सेवा आश्रम, जौरा, मुरैना में मोहर ने अपनी गैंग के 140 डाकुओं के साथ सरेंडर कर दिया। मोहर ने MP के मुख्यमंत्री और वीपी सिंह की मौजूदगी में महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने हथियार डाले थे। कोर्ट ने मोहर को 20 साल की सजा सुनाई। बिना शर्त मोहर को खुली जेल की सुविधा दी गई। जेल में रहते हुए भी मोहर ने खूब कांड किए।

जेल में मुर्गा-मटन खाता था, एक दिन सुपरिटेंडेंट को ही पीट दिया

अपने साथी डकैतों के साथ सरेंडर के बाद मोहर सिंह जेल में ही अपनी अदालत लगाने लगा था। जेल के सुपरिनटैंडैंट को ये बात पसंद नहीं आई। उसने मोहर और उसके साथियों के साथ बदसलूकी की और उन्हें पीटने की धमकी दी। सुपरिनटैंडैंट ने जैसे ही गाली बकते हुए धमकी दी उसके अगले ही मिनट मोहर ने उसकी कॉलर पकड़ी और उसे घसीट-घसीट कर मारा। जब ये बात सूबे के मुख्यमंत्री तक पहुंची तो मुख्यमंत्री ने कॉल कर कहा, “बड़ी मुश्किल से इन डाकुओं को जेल तक ला पाए हैं। जैसे रह रहे हैं रहने दीजिए।”

ऐसे ही एक दिन मुरैना के SP ग्वालियर जेल पहुंचते हैं। जेल की देहलीज पर मोहर को देखते ही कहते हैं, “अगर 10-12 दिन और बाहर रहता तो मैं तेरा एनकाउंटर कर देता।” मोहर ने कहा, “अभी हाथ आजमा लो। गीदड़ भभकी मत दो, जब बाहर था तो दर्शन के लिए भी तरसते थे।”

जज ने फांसी देने की बात की, मोहर के जवाब से पूरी अदालत में सन्नाटा पसर गया

जेल में रहते हुए मोहर पर लगे मुकदमों की सुनवाई होती रहती थी। हत्या के एक मुकदमे में जज ने मोहर को फांसी की सजा सुना दी और साथ ही 10 हजार का जुर्माना भरने का हुक्म दे दिया। जज का जवाब देते हुए मोहर ने कहा, “साहब, मैं फांसी पे लटक जेहों तो तुम्हाओ जुर्माना को भरहे? मोरे परिवार के पास 10 हजार को इंतजाम नाइयां।” ये बात सुनते ही भरी अदालत में सन्नाटा पसर गया था। ये वाकया खुद मोहर सिंह ने एक टीवी इंटरव्यू में बताया था। मोहर 8 साल यानी साल 1980 तक जेल में रहा फिर उसे इंदिरा के कहने पर रिहा कर दिया गया। बाद में मोहर सिंह को जमीन दी गई। बच्चों की पढ़ाई के लिए वजीफा दिया गया।

राजनीति में एंट्री, मीडिया से बोला करता था, “मैंने सैकड़ों मर्डर किए”

जेल से निकलने के बाद मोहर सिंह ने राजनीति में भी हाथ आजमाया। मेहगांव नगरपालिका का अध्यक्ष चुना गया वो भी निर्दलीय। हमेशा कांग्रेस का समर्थन किया। उसका कहना था, कांग्रेस के समय में ही उसने सरेंडर किया था। तब कांग्रेस ने उसकी मदद की थी इसलिए वह उनका समर्थन करता है। सामान्य जीवन में वापस लौटने के बाद उसके मीडिया इंटरव्यूज का सिलसिला शुरू हो गया। एक पत्रकार ने उससे पूछा डकैत रहते आपने कितने मर्डर किये? मोहर सिंह बोला, “बस जे न पूछो, बीहड़ में खून खराबा तो खूब होता था। उस समय मेरे नाम पर 400 मर्डर थे। ज्यादातर मैंने किए, बाकी गैंग के लड़के कर आते थे। नाम मेरा ही होता था।”

फिल्में बनी, खुद एक्टिंग भी करी फिर 92 साल की उम्र में निधन हो गया

जेल से बाहर आने के बाद मोहर सिंह के जीवन पर कई फिल्में भी बनीं। 80 के दशक में मोहर सिंह के चलते ही बॉलीवुड में डाकू वाली फिल्मों का ट्रेंड आ गया था। साल 1982 में मोहर सिंह के जीवन पर एक फिल्म बनी जिसका नाम ‘चंबल के डाकू’ था। इस फिल्म में अपना किरदार खुद मोहर सिंह निभाया था।
5 मई, 2020 को सुबह 9 बजे, लंबी बिमारी के बाद 92 साल की उम्र में मोहर सिंह का निधन हो गया। कोरोना लॉकडाउन की वजह से उनके अंतिम संस्कार में 15-20 से ज्यादा लोग नहीं जुड़ पाए थे।

About The Author

निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

Learn More →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अपडेट खबर के लिए इनेबल करें OK No thanks