
ये राजनीति है किसी मंदिर का प्रसाद नहीं जो बिना कुंडली देखे बांटदी जाती है,देश और पब्लिक की परवरिश से खिलवाड़ करने के लिये—
काम के आधार पर अगर टिकट मिलने लगे तो सारी बिसंगतिया खत्म हो जाए न धर्म आढे आऐ न शक्ति का प्रदर्शन आज टिकट कामके नहीं पैसे और ताकत के आधार पर—-राजनीति कहां हो रही है बंसवाद और जातिवाद के हाथों मे राजनीति का खुलकर मुखौल उड़ रहा है,पब्लिक की कौन सुनता है,उसके अधिकारों का बंदरबांट खुलकर उसकी आँखों के सामने होता रहता है कुछ करने की बजाय पब्लिक असहाय सी देखती रहती है,जिसकी लाठी उसकी—-राजनीति हो रही है कहां नेता की जीवन शैली और कार्यप्रणाली देखी जा रही है एक जानवर भी जहां बैठता है वहां झाड़पौंछ लेता है लेकिन एक नेता अपना कार्यकाल पाँच सालों तक नहीं करके सात पीढियों का बदोबस्त करके दूसरे रिनूवल की तैयारी मे जुट जाता है यहां जिम्मेदार कौन है इसको अपनी आत्मा में झांकना जरूरी है, राजनीति की टिकट ना होकर किसी मंदिर का प्रसाद बना दिया गया जो पीढियों दर पीढियों और पैसे के बलपर दस गुनाह, और मर्डर, करके भी बिना परेशानी के मिल जाती है,जुवानी स्वतंत्रता तो खैरात प्राप्त हो गई कहने को कि मे राम राज्य और रावण राज्य कर रहा हूँ, इसमे भी दोषी पब्लिक है जो अपने भोगपान और आँखों देखी का इजहार करने मे असमर्थ है।
लेखिका, पत्रकार, दीप्ति चौहान।