
पुलिस को मजबूर नही मजबूत होना चाहिए
ब्लाक प्रमुख के चुनाव को लेकर भाजपाइयों ने गुंडागर्दी की जो तस्वीर पेश की है उसका तजकरा आम है लेकिन सत्ता के हाथों की कठपुतली बन चुकी पुलिस को असहाय देखकर तरस आता है। गरीब और मजलूम लोगों पर लाठी बरसाते हुए पुलिसवाले मंत्रमुग्ध होते हैं। सत्ताधारी नेताओं को देखकर पुलिसवालों के हाथों से लाठी उठती नही है और हाथ कांपने लगते हैं। ऐसा ही कुछ नजारा कल ब्लाक प्रमुख के चुनाव के दौरान देखने को मिला।
जहां एक ओर भाजपाई गुंडे बेखौफ होकर गुंडई कर रहे थे और पुलिस उनके आगे नतमस्तक होकर मूकदर्शक बनी हुई थी तो वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों के नेताओं से जोर आजमाइश कर रही थी। कल जो हुआ वो लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक था। कल ब्लाक प्रमुख के चुनाव के बहाने एक दिन के लिए लोकतंत्र को गुंडातंत्र में तब्दील किया गया जिसकी तस्वीरें इंटरनेट के समुद्र में तैर रही हैं। लोकतंत्र को एक दिवसीय गुंडातंत्र बनाने के लिए सिर्फ और सिर्फ स्थानीय पुलिस बल जिम्मेदार है।
पुलिसवालों के शरीर पर खाकी वर्दी और कांधों पर लगे स्टार किसी सत्ताधारी नेता की दी गई भीख नही हैं। पुलिस का काम कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त रखना होता है ना कि सत्ताधारी नेताओं की गुलामी करना? इस दौर के पुलिसवाले ईश्वर से ज्यादा सत्ताधारी नेताओं से डरते हैं। ट्रांसफर और सस्पेंड होने के डर से पुलिसवाले सत्ताधारी नेताओं की ऐसी गुलामी करते हैं जिसकी मिसाल पालतू कुत्ते से दी जा सकती है। पालतू कुत्ता कम से कम एक मालिक का तो वफादार होता है लेकिन हर 5 साल बाद पुलिस का मालिक ही बदल जाता है। मालिक की ऐसी वफादारी का क्या जो 5 साल तक उसके इशारे पर नाचना पड़े और सत्ता बदलते ही नए मालिक के इशारे पर पुराने मालिक पर भौंकना पड़े उसे काटना पड़े।
हमारी पुलिस को मजबूर नही मजबूत होना चाहिए ताकि आम जनता पुलिस की निष्पक्षता की तारीफ करे और हम जैसे स्वतंत्र पत्रकारों को ऐसा वैसा न लिखना पड़े। हमें भी तकलीफ होती है जब हम अपनी पुलिस के बारे में कुछ गलत लिखते हैं क्योंकि हमारे बुरे वक्त में पुलिस ही हमारे काम आती है। पुलिस को मसीहा माना जाता है और जब मसीहा सत्ताधारी नेताओं के हाथों की कठपुतली बन जाये और मजबूर हो जाये तो तकलीफ होती है तो इसी तरह लिखकर अपनी भड़ास निकालनी पड़ती है ताकि किसी मजबूर पुलिसवाले का ज़मीर जाग जाए और उसे अपना कर्तव्य याद आ जाये फिर वो सत्ताधारी नेताओं की आंखों में आंखें डालकर कह सके ये खाकी वर्दी तेरे दी हुई खैरात नही है?