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अंतरधार्मिक जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करते समय महिला का इस्लाम में धर्मांतरण प्रासंगिक कारक नहीं होना चाहिए: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

⚫एक अंतर-धार्मिक जोड़े, जिन्होंने आरोप लगाया था कि निजी प्रतिवादी उनके वैवाहिक जीवन और स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर रहे हैं, की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता (लड़की) के इस्लाम स्वीकार करने का तथ्य यह, सुनिश्चित करते हुए कि याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्रता में कोई हस्तक्षेप ना हो, प्रासंगिक कारक नहीं होगा।

???? जस्टिस सलिल कुमार राय की पीठ एक लड़की (20 वर्ष की आयु, जिसने इस्लाम स्वीकार कर ‌लिया) और पुरुष (40 वर्ष की आयु) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी और उन्होंने प्रतिवादियों को उनके वैवाहिक जीवन और स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करने का निर्देश देने की मांग की।

????याचिकाकर्ता का दावा था कि वे बालिग हैं और उन्होंने अपनी मर्जी से शादी की है और यह भी आरोप लगाया कि निजी प्रतिवादी उनके वैवाहिक जीवन और स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

???? लता सिंह बनाम यूपी राज्य, एआईआर 2006 एससी 2522, मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह तय कानून है कि जोड़े बालिग होने की स्थिति में बिना किसी हस्तक्षेप के शांति से रहें।

????अदालत ने कहा कि लता सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट घोषणा के मद्देनजर, संबंधित अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के मद्देनजर उपरोक्त निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करें।

????कोर्ट ने कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता पर कोई वास्तविक खतरा है, या लता सिंह में निर्धारित कानून के विपरीत उन्हें परेशान किया जाता है, तो वे संबंधित जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से संपर्क करें और उस संबंध में आवश्यक विवरण प्रस्तुत करें, जैसे कि उनके बालिग होने, विवाह और कथित उत्पीड़न आदि का सबूत, जो यह सुनिश्चित करने के लिए कानून में आवश्यक सभी कदम उठाएंगे कि याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न हो,

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया,

????”याचिकाकर्ता, यदि बालिग हैं, विवाहित न होने पर भी साथ रहने के हकदार हैं और इसलिए, उनके विवाह के प्रमाण की आवश्यकता नहीं होगी और संबंधित पुलिस अधिकारी द्वारा जोर नहीं दिया जाएगा। आगे स्पष्ट किया गया कि याचिकाकर्ता ने इस्लाम स्वीकार कर ‌लिया है, यह उसकी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न हो, यह तय करने का प्रासंगिक कारक नहीं होगा, जब तक कि याचिकाकर्ता ने जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप नहीं लगाया है।”

केस टाइटल – यशी देवी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और तीन अन्य

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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