कोरोना का कहर जारी
यूपी में 100 से अधिक मीडियाकर्मियों की चढ़ी बलि
रिपोर्ट

लखनऊ। जानलेवा कोरोना बीमारी का सच जनता के सामने परोसते-परोसते बीते एक माह के अंदर यूपी के सैकड़ों चौथे स्त भ के प्रहरी यानी पत्रकारों को असमय मौत ने अपने अगोश में समेट लिया है। पत्रकारों को इस महामारी का सामना करते हुए दो मोर्चो पर लडऩा पड़ रहा है जहां सरकार की नाकामियों को सामने न लाने के लिए दबाव झेलना पड़ रहा है वहीं कोरोना की गिर त में आकर बगैर ऑक्सीजन और इंजेक्शन के तिल-तिल कर जान देनी पड़ रही है। दूसरों की खबर देने वाले पत्रकारों की मौत पर न तो सरकार मरहम लगा रही है और न ही तथाकथित पत्रकार हितैषी संगठन अपना उत्तरदायित्व निभा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि यूं तो कोरोना बीमारी ने छोटा, बड़ा, गरीब-अमीर सबको अपनी गिर त में ले रखा है। अधिकतर इस घातक बीमारी की चपेट में अपनों को खोया है। बीते साल भी कई पत्रकारों को कोरोना ने लील लिया था। लेकिन इस बार मार्च 2019 से लेकर अब तक प्रदेश के सैकड़ों मान्यता और गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की कोरोना ने बलि ले ली है।
इन पत्रकारों की कोरोना से हुई मौत
प्राप्त सूचनाओं के मुताबिक वरिष्ठï पत्रकार प्रमोद श्रीवास्तव (लखनऊ), ताविशी श्रीवास्तव (लखनऊ), विनय प्रकाश श्रीवास्तव (लखनऊ), पीपी सिन्हा (लखनऊ), केशव पाण्डेय (लखनऊ), मदन बहादुर सिंह (लखनऊ), प्रशांत सक्सेना (बरेली), पवन मिश्रा (लखनऊ), राशिद मास्टर साहब, हिमांशु जोशी (लखनऊ), अमृत मोहन (लखनऊ), निलांशु शुक्ला (लखनऊ), सच्चिदानंद गुप्ता सच्चे (लखनऊ), दुर्गा प्रसाद शुक्ला (लखनऊ), मोह मद वसीम (लखनऊ), हमजा रहमान (लखनऊ), रफीक (लखनऊ), अंकित शुक्ला (लखनऊ), चंदन प्रताप सिंह (लखनऊ), सलाउद्दीन शेख, मोह मद कलाम (लखनऊ), मोह मद वसीम (लखनऊ), रीता सिन्हा (लखनऊ), कैलाश नाथ विश्वकर्मा (लखनऊ), अजय शंकर तिवारी (गोरखपुर), मनोहर अंधारे, राशिद, डा. राम नरेश त्रिपाठी (वाराणसी), अरूण पाण्डेय, लोकेन्द्र सिंह, प्रशांत सक्सेना, गोपाल मिश्र (औरैया), रामेन्द्र सिंह (वाराणसी), रत्नाकर दीक्षित (वाराणसी), बद्री विशाल (वाराणसी), शंभूनाथ उपाध्याय (वाराणसी), विजय सिंह (वाराणसी), ओम प्रकाश जायसवाल, जुनैद अहमद, सतीश मिश्रा (कासगंज) दुष्यंत कुमार (मेरठ), मधुसूदन त्रिपाठी (लखनऊ), शेष नारायण सिंह (सुल्तानपुर), सुभाष मिश्र (लखनऊ), राशिद खान (मुज्जफरनगर), गोपी उर्फ जसविंदर (मुज्जफरनगर), दिनेश पाठक (अलीगढ़), प्रशांत सक्सेना (बरेली), गोविंद भारद्वाज (बदायूं) पकंज कुलश्रेष्ठï (आगरा), बृजेन्द्र पटेल (आगरा), अमित भारद्वाज (आगरा), विजय शर्मा (आगरा), अमी आधार (आगरा) का कोरोना से निधन हो चुका है। अभी भी यूपी के तमाम ऐसे जिले हैं जिनके पत्रकार कोरोना की बलि चढ़ चुके हैं, लेकिन उनकी सूचना प्राप्त नहीं हो पाई है। एक अनुमान के अनुसार यूपी के 75 जिलों में लगभग 100 से अधिक पत्रकारों की बलि चढ़ चुकी है।
पत्रकारों के सामने जान और जहान का यक्ष प्रश्न
पत्रकार हितैषी संगठन कोरोना महामारी के चलते बिलों में दुबक कर बैठ गए हैं। मौजूदा समय कोविड-19 प्रोटोकॉल की आड़ में खुद को सुरक्षित रखने के लिए सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया से निधन की सूचनाओं पर संवेदना प्रकट करना और सरकार से आर्थिक सहायता के लिए प्रेसनोट जारी कर जारी कर अपनी औपचारिकताएं निभा रहे हैं। इसके साथ ही कोरोना ने पत्रकारों पर आर्थिक तौर पर तगड़ी चोट की है। तमाम पत्रकारों की नौकरियां जाने से बेरोजगार हो गए हैं। आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा रहा है। मुफलिसी की हालत में किसी से सहायता मांगने की हि मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं।
*हवा-हवाई हैं सरकार के दावे
तमाम पत्रकारों के परिजनों को सरकारी अव्यवस्था की बलि चढ़े हंै। सबसे दुखद तथ्य यह है कि तमाम पत्रकारों के परिजन बगैर बेड, ऑक्सीजन, इंजेक्शन और दवाओं के दम तोड़ा है। यूं तो सरकार की नजरों में सब हरा ही हरा है। कोई भी समस्या नहीं है। जिसकी वजह से पत्रकारों को भारी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। वरिष्ठï पत्रकार मनोज मिश्र का कहना है कि स्वास्थ्य मोर्चे पर सरकार बुरी तरह से फेल हुई है। सरकार के कुछ विश्वासपात्र अफसरों के कारण स्वास्थ्य सेवा बुरी तरह से चरमरा गई है। सरकार ने तो बीमारों को बेड, दवा, आक्सीजन, इंजेक्शन उपलब्ध करा पा रही है और न ही कोरोना संक्रमितों की बढ़ती सं या पर काबू पा रही है। सरकार की इस नाकामी के कारण पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि सरकार पत्रकार हितों की बात तो करती है लेकिन धरातल पर कुछ भी नहीं करती है। पत्रकारों और उनके परिजनों को वैक्सीन नहीं लग पा रही है। जबकि सरकार दावा कर रही है कि पत्रकारों के ऑफिस में वैक्सीन लगेगी। इसके साथ ही यूपी को छोड़कर बहुत राज्यों ने मीडिया को कोराना वारियर घोषित कर दिया है। लेकिन अफसरों की अड़ंगेबाजी के कारण यूपी में मीडिया को कोराना वारियर घोषित नहीं किया जा रहा है। बस मीडिया को लुभाने के लिए दावे किए गए हैं कि वैक्सीन लगवाने में प्राथमिकता दी जाएगी और मृत्यु पर पांच लाख रुपए की मदद दी जाएगी।