
एटा-ढिढोला पीटने से शांतिपूर्ण मतदान नही हो सकता है,मतदान से एक रात पूर्व की घटनाओं ने पोल खोलदी यह एटा का बेखौफ इलाका है,यहां आसानी से सबकुछ नहीं सुधर सकता है।*
एटा-प्रत्याशियों के गांव मे न कोरोना जाता है,न कर्फ्यू मान्य, अगर एसा होता तो रातभर वोट की सांठगांठ नहीं हो सकती थी।*
हमारे समाज की यही विडंबना है,कि भूँख और बोतल की लतने पूरे समाज का आईना ही गंदा करके रख दिया है,चंद शिक्कों मे पांच साल की तबाही खरीद बैठते है नशा तो तब उतरता है,जब खाली और टूटी बोतल का कांच खुदके और आवाम के अधिकारों का हथियार बन जाता है शर्मनाक हो चुका है कुछ मानशिकताऔं का स्तर पर यहां तो वही कहावत सटीक बैठती है सनम हमतो डूबे ही है साथमे आपको—-इन सातिरों पर न शासन की पकड़ हो पाती है न प्रशासन और पब्लिक की क्यों कि ताली बजाने के लिये हाथ दोनों जो मिल जाते है और पब्लिक की आस का दम हरबार इसी तरह घोट दिया जाता है,तब यही कहना है कि अपने शहर आसपास की प्रोगरेस के गुनहगार हम खुद है यदा कदा चीखते इंसान की आवाज फिर कैसे पहुंचे उस सत्ता तक जहां पैसों की दीवार हम खुद लगा बैठे हो।
सुकून बेचकर हम सुकून की आस लगाए बैठे है,
बिकी हुई चीज कहां लौटती फिर—