
सुप्रीम कोर्ट का लेटेस्ट #जजमेंट का रेफरेंस,
जिसमें कहा गया है कि किसी भी #प्रापर्टी का मालिकाना हक “#कब्जा” से नहीं, बल्कि “#रजिस्टर्ड सेल डीड” से तय किया जाएगा।
केस टाइटल: Sanjay Sharma V/s Kotak Mahindra Bank Ltd & Ors (2024).
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला – अब कब्जा नहीं, रजिस्ट्री ही तय करेगी मालिकाना हक़
अब सिर्फ किसी जमीन या मकान पर #कब्जा कर लेने से आप उसके #मालिक नहीं बन जाएंगे।
असली मालिक वही माना जाएगा जिसकी #रजिस्ट्री वैध तरीके से हुई हो।
देश की सबसे बड़ी अदालत #सुप्रीम_कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी प्रॉपर्टी को #खरीदता है
और
सिर्फ #कब्जा लेकर बैठ जाता है, लेकिन उसकी #रजिस्ट्री नहीं करवाता
तो
वह उस संपत्ति का मालिक नहीं माना जाएगा।
जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने यह भी कहा कि जब तक संपत्ति की बिक्री कानूनी तरीके से #रजिस्टर्डसेलडीड के जरिए नहीं होती, तब तक उसका #ट्रांसफर वैध नहीं माना जाएगा।
कानून क्या कहता है?
1882 के ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के सेक्शन 54 के मुताबिक, अगर किसी #अचल संपत्ति की कीमत 100 रुपये या उससे ज्यादा
है,
तो उसका मालिकाना हक तभी ट्रांसफर होगा जब वह बिक्री #रजिस्ट्री के जरिए किया गया
हो।
यानी चाहे आपने #पूरे_पैसे दे दिए हों और #कब्जा भी ले लिया हो,
तब भी कानूनी रूप से आप मालिक तब तक नहीं माने जाएंगे जब तक आपने रजिस्ट्री नहीं करवाई।
बिचौलियों को झटका?
इस फैसले का असर प्रॉपर्टी डीलरों और बिचौलियों पर भी पड़ेगा। अब #पावरऑफअटॉर्नी या #वसीयत के जरिए प्रॉपर्टी खरीदने-बेचने का चलन पूरी तरह #खत्म हो जाएगा।
जो लोग अब तक सिर्फ #कागजों के दम पर जमीनों का सौदा कर लेते थे,
उनके लिए यह झटका साबित होगा।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मालिकाना हक सिर्फ रजिस्ट्री से ही मिलेगा, न कि किसी अनौपचारिक कागज से।
नीलामी वाले केस से आया #फैसला?
इस फैसले की शुरुआत एक ऐसे मामले से हुई जिसमें एक व्यक्ति ने संपत्ति को नीलामी में खरीदा था। लेकिन उसके पास रजिस्टर्ड सेल डीड नहीं थी।
मामला कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जिस व्यक्ति के पास कानूनी तौर पर #रजिस्ट्री हुई बिक्री विलेख है, वही #असली मालिक माना जाएगा।
कुछ खास मामलों में, विशेष परिस्थितियों में ही किसी की प्रॉपर्टी को अधिग्रहित कर सकती है।
इस फैसले के साथ कोर्ट ने 1978 के उस पुराने फैसले को #रद्द कर दिया था
जिसमें #सरकार को जरूरत से ज्यादा #अधिकार दे दिए गए थे।
इस फैसले के साथ कोर्ट ने 1978 के उस पुराने फैसले को रद्द कर दिया था
जिसमें सरकार को जरूरत से ज्यादा अधिकार दे दिए गए थे। अब यह साफ हो गया है कि नागरिकों का संपत्ति पर अधिकार पूरी तरह सुरक्षित है।
रजिस्ट्री के दम पर किसी को संपत्ति का पूरा हक नहीं मिलता है.
संपत्ति के मालिकाना हक के लिए सिर्फ रजिस्ट्री पर्याप्त नहीं है.
इसके लिए अन्य कानूनी दस्तावेजों और प्रमाणों की भी आवश्यकता होगी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने नए डिबेट को जन्म दे दिया है.
कोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्रेशन किसी व्यक्ति के दावे का समर्थन कर सकता है, लेकिन यह संपत्ति पर कानूनी कब्जे या नियंत्रण के बराबर नहीं है.
कोर्ट के इस फैसले से प्रॉपर्टी होल्डर्स, रियल एस्टेट डेवलपर्स पर काफी असर पड़ने वाला है.
क्या है रजिस्ट्रेशन और ओनरशिप में अंतर
भारत में संपत्ति रजिस्ट्री की प्रक्रिया काफी लंबे वक्त से चल रही है और अधिकांश लोग इसी को स्वामित्व का अधिकार मानते
हैं.
अगर आपके नाम पर प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री है तो आप उसके मालिक हैं, यही माना जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से स्पष्ट हो गया है कि स्वामित्व के लिए सिर्फ रजिस्ट्री पर्याप्त नहीं है.
इसके लिए आपको ओनरशिप चाहिए. कोर्ट का मानना है कि इससे संपत्ति विवाद कम होंगे और संपत्ति धोखाधड़ी के मामलों पर भी रोक लगाएगा।
Sanjay Sharma v. Kotak Mahindra Bank Ltd & Ors (2024).
“All the documents relied upon by respondent to claim ownership of the secured asset are unregistered documents and fail to meet the requirements of a valid sale under Section 54 of the Transfer of Property Act.”
Justice BV Nagrathna and Justice N Kotiswar Singh