पढ़िए नारी जीवन के किरदार हंसते हंसते कभी मानव

,बस एक पन्ना चैन लिख कर–
छोड़ देती है बाबुल के अंगना–
जिस्म मंदिर में बैठी रही रूहें नारी–
कौन खोल पाया है मिलन के पट इसके- जितना खोदा गया इसको गहरी होती गई नारी–
बहुत कम परिचय हुआ है नारी और पुरुष का कोई जिस्म तक पहुंचा तो कोई सूरत तक कोई आंखों के समंदर में नहाता रहा—
हथेलियां मैल मे डूबी बहुत देखी गई-कोई पंडित नहीं पहुंचा लकीरें तकदीर तक जिस्मे जमीन में उग उग के मरता रहा वजूदे नारी–
जहाने भोगियों में खर्चती रही नारी–
रूह मंदिर में जी-जीकर मरती रही–
मूंक अंधी बहरी खर्चती रही खुदाई सी नारी–
हस्र हाले देख सुन सह कर अपना–
खामोश खुदाई लुटाती रही नारी–
नजर और नजरियों की रौशनी में–
धूप छांव में दिखती रही नारी–
तिल तिल जली है बे धुआं आग में–
अरमान और अपमान की लकड़ियों से–
जनाजे कौन देखता–
अपना कंधा अपनी सांसें ढोती रही नारी–
नारी अपना जीवन-
गुड़ियां खेलते खेलते अपने जीवन को उगता देख लेती है–
जैसे कि बोलता हुआ कोई गूंगा किरदार जीवन धेर्य के होंठों के भीतर कांपता रह गया हो अनमने जीवन का सब मौत को सौंप कर बीज नारी का बोकर उड़ गया रूहे
परिंदा कोई–
संग गुड़ियों के खेल ही खेल में पहन कर जीवन उतार कर छोड़ देती है वहीं बाबुल के अंगना–
कभी हंसती थी कभी रोती थी कभी नाचती तो कभी गाती थी बेखौफ आंचल में बांधकर छोड़ देती है वहीं बाबुल के अंगना–

महंगे लिवासो में सजाती थी गुड़ियों के जिस्म दुल्हन से बनाकर दहलीज पार कराती थी थोड़ी दूर तक रोती थी-
उन माली और मालिन के लिए अपनी मासूम कली फूल के खिलते यौवन की परवरिश के लिए और खामोश हो जाती है-खुश्बू में लिपटी दूसरे आंगन के गुलशन में महकने के लिए चंद कदमों तक साथ चल कर समा जाती है रूहों में गुड़ियां छोड़ देती है वहीं बाबुल के अंगना–
और वही जीवन जिंदा जिंदगी में जीने के लिए- सफर पर चल पड़ती है यूं तो मंजिलें बहुत है पर घूमती रहती है दो आंगन के सफर में न मंजिलें मिलती है न खुदसे-
रूहों में जी जाती है जिस्म की पहचान से–
दिले मंदिर को खोलती है तो श्मशान नजर आता है–
फुर्सते सफर से जब देखती है मुड़कर खुद को नारी–
धुंधली आंखों की रौशनी से यौवन किसी कागज पर अधूरी तस्वीरों में- कोई जिस्म बना कर छोड़ गया कोई चेहरा,कोई रूह के मंदिर तक आते आते लौट गया-
पांव पापा ने जो मासूम सहलाए थे कभी–
हथेलियों पर रखकर शायद उन्हें परियों के रास्तों पर कंकड़-पत्थर नजर आए होंगे—
धुंधली आंखों की रौशनी बस इतनी दूर तक पहुंची —
पहले आंगन की कली मुस्कराती मुर्झाए फूल की सिलवटों और झुर्रियों में हल्की छाया सी दिखी-अपने ही गुनाहों की अदालत में जब देखा खड़ा दिले मंदिर में ताजा श्मशान सा दिखा-
क्या ढूंढती फिर ठंडी राख मे–
वजूद की अस्थियां नारी–
यकीं होने लगा है अब लौटेगी फिर दोबारा–
अपनी ही जमीन पर बीज वजूदों का लेकर नारी–
नारी जीवन की कहानी पढ़िए हंसते हुए किरदारों में–
एक जीवन और दो आंगन में–
एक में मासूमियत पैदा हुई-दूसरे में मासूमियत पैदा की–
पढ़िए नारी जीवन के किरदार हंसते हंसते कभी मानव मशीनों में कभी मानव गुलामी तो कभी मानव परवरिश में–
भरे पड़े हैं किरदार इसके किताबो में–
सोच और नजरियों के अल्फाजों में–
बस एक पन्ना चैन का लिख छोड़ देती है वहीं बाबुल के अंगना–
लेखिका-पत्रकार-दीप्ति चौहान।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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