
एटा की नगर पालिका,और कार्य प्रणाली–
रौशनी का पर्व आया और निकल गया पर सिस्टम जिस के तस में अडिग रहा बात नगर पालिका की है कि हर कार्य के लिए पब्लिक आपके आगे हाथ फैलाए और लिखित कम्पलेंड देकर ही अपने अधिकार मांगने को आपसे मजबूर रहे बार-बार तो आपकी कार्य प्रणाली जनहित के लिए बनी ही नहीं है दशियों साल से लगी लट्ठों पर लाइटें कालोनियों में जिनके कनेक्शन तक सड़ गये लाइटें फ्यूज होकर महीनों से कालोनियों में अंधकार पसरा हुआ है पर आपकी कार्य प्रणाली ने इस रौशनी के पर्व को भी रौशनी देना उचित नहीं समझा–सादर और सम्मान से आदरणीय आपसे सवाल है कि आपकी गाड़ी जो कूडा़ उठाने के लिए सुबह में आती है बो वापसी में कितना कूड़ा उठाकर ले जाती है हकीकत तो यह है बो गाड़ी कूड़े के ढेर पर कूड़ा कुचलती हुई निकल जाती है एक अच्छा सा गाना सुनाते हुए पल-पल दिल के पास तुम रहती हो, पर कूडे़ का तिनका भी नहीं उठाती क्यों कि उस गाड़ी में कोई कूड़ा उठा कर डालने बाला ही दूसरा व्यक्ति नहीं होता है, फिर किस काम की सेवा है इस गाड़ी की-और आपके झाड़ू बाले कर्मचारी हर गली और सड़क पर हर रोज झाड़ू नहीं लगाते हैं पर लगाते जरूर है,आपको पब्लिक ने एक विस्वास की कुर्सी बुनकर दी है,उम्मीदों पर- आपको जनहित के अधिकारों और अपनी कार्यप्रणाली पर विषेश ध्यान देना जरूरी हो जाता है खासकर इन सब चीजों और अविव्स्थाऔ को एक महिला से ज्यादा पुरूष कभी नहीं समझ सकता है।
दीप्ति,✍️