
खूनी दरवाजा, दिल्ली के 13 बचे हुए दरवाजों में से एक है। ये दरवाजा शेरशाह सूरी ने बनवाया था और ये दिल्ली गेट के पास, बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित है। इसे पहले काबुली दरवाज़ा भी कहते थे।
इस दरवाजे को “खूनी” यानी खून से सना हुआ नाम मिलने के पीछे कई सारी खौफनाक कहानियां हैं
जहाँगीर ने अपने बाप अकबर के कुछ दरबारियों के बेटों को मौत की सजा सुनाई थी और उनकी लाशों को इसी दरवाजे पर सड़ने के लिए छोड़ दिया था।औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह को हराने के बाद, उनके सिर को यहीं इसी दरवाजे पर सबको दिखाने के लिए टांग दिया था।
अंग्रेजों के अफसर मेजर विलियम हडसन ने तीन मुगल राजकुमारों – बहादुर शाह जफर के बेटों मिर्जा मुगल और मिर्जा खिज्र सुल्तान और उनके नाती मिर्जा अबू बख्त को इसी दरवाजे के पास गोली मार दी थी। उनकी बेजान लाशों को चांदनी चौक के पास एक कोतवाली के सामने तीन दिनों तक सबको दिखाने के लिए रखा गया था।
1739 में, ईरान के बादशाह नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया था, उस वक्त भी यहां खून-खराबा हुआ था, हालांकि कुछ इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं है। 1947 के दंगों में, पुराना किला में बने शरणार्थी कैंप में जाने वाले कई लोगों को इसी दरवाजे के पास मार दिया गया था।
आज ये खूनी दरवाजा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की हिफाजत में है। ये 15.5 मीटर ऊंचा है। इसमें तीन मंजिलें हैं और तीनों मंजिलों तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। ये कहा जाता है कि ऊपर वाली मंजिलों का इस्तेमाल कभी गुनाहगारों और दुश्मनों के सिरों को सबको दिखाने के लिए किया जाता था।
हालांकि, साल 2002 में एक मेडिकल स्टूडेंट के साथ हुए बलात्कार के बाद से इस दरवाजे को आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया है।