*रामलीला ख़त्म खेल शुरू होगा!

एटा,सैनिक पड़ाव में करीब 1952 में दिए गए उस समय के एक कागज़ पर लिखें शब्द जो कि किसी भी न्यायिक प्रक्रिया के तहत मान्य नहीं हो सकता है। सैनिक पड़ाव पर रामलीला कमेटी का कब्ज़ा प्रत्येक बर्ष हो रहा है और इस पुरे तमाशे को जिला प्रशासन खुली आँखों से देखता है।
1952 के एक कागज के बल पर जिलाधिकारी व बरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के प्रशासनिक सहयोग से रामलीला कमेटी इस ग्राउंड पर व्यावसायिक दुकाने लगाते है।जबकि सरकार व प्रशासन को लाखो का चूना इसलिए लगा दिया जाता है कि रामलीला कमेटी इन अधिकारीयों से एक लाल फीता कटा देते है।जबकि इस सैनिक पड़ाव या रामलीला कमेटी का एक इंच का कागज जिला प्रशासन के पास सरंक्षित नहीं है। आखिर क्यों नहीं!!
*अब खेल होगा!*
तत्कालीन जिलाधिकारी अंकित अग्रवाल द्वारा पूर्व बर्ष में इस ग्राउंड पर दुकानों को नीलाम कर दुकाने आवटित की गई थी।जिसमें सरकार को काफ़ी अच्छा राजस्व का लाभ भी हुआ था। इस नीलामी से आम जनमानस को कम कीमत में दीपावली मनाने के लिए पटाखे भी खरीदने को मिले थे।
सोचिये इस अनट्रेंड रामलीला कमेटी को सैनिक पड़ाव में पटाखे लगाने की जिम्मेदारी दें दी गई तो बड़ी घटना को नहीं रोका जा सकता है। सभी जानते है कि बारूद के ढेर पर एक चिंगारी बहुत होती है! बड़ी घटना घटित होने से अच्छा है कि इस सैनिक पड़ाव पर पटाखा दुकाने खुद आवटित करें, घटना होने से जिला प्रशासन ही रोक सकता है।
तहसील प्रशासन पर इस समय पटाखों की दुकानों की अनुमति देने के प्रपत्र भी प्राप्त हो रहे है। लेकिन इस बारूद के ढेर की जिम्मेदारी कौन लेगा यह संसय बना हुआ है। अगर यह जिम्मेदारी रामलीला कमेटी को फिर दें दी गई और कोई अप्रिय घटना घटित हो गई तो क्या सदर SDM भावना विमल या जिलाधिकारी जिम्मेदारी लेगे…. शायद नहीं!!
*सबसे अच्छा प्रयास *
पूर्व में जिला प्रशासन नें अपनी देखरेख में पटाखे की दुकाने आवटित की थी,आम जनमानस भी सुरक्षा चाहता है। *जिला प्रशासन को चाहिए कि पूर्व की भांति ही प्रशासन की देखरेख में ही दुकाने आवटित हो।*