*मौसम की मार और चुभती कीमतें, रिपोर्ट योगेश मुदगल

एटा,बहुत प्रयासों के बाद चीजें सुधरना शुरू हुई थीं। भारत की खुदरा मुद्रास्फीति मध्यम अवधि में 4 प्रतिशत के लक्ष्य की ओर बढ़ने लगी थी, लेकिन जून में खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने अच्छे होते माहौल को थोड़ा बिगाड़ दिया। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति पिछले महीने के 4.3 प्रतिशत से बढ़कर तीन महीने के उच्चतम 4.8 प्रतिशत पर पहुंच गई। गर्मी के महीनों के दौरान खाद्य पदार्थों, विशेष रूप से सब्जियों की कीमतों में वृद्धि कोई नई बात नहीं है, पर माह-दर-माह के आधार पर देखें, तो खाद्य व पेय पदार्थों की मुद्रास्फीति 20 महीनों में सबसे अधिक 2.2 प्रतिशत पर पहुंच गई। सब्जियों की कीमतें 12.2 प्रतिशत बढ़ गईं।
हालांकि, इस मौसम में कीमतें बढ़ने की आशंका पहले से थी। खराब मौसम ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। अनाज की कीमतों में उतार का दौर शुरू हो गया था, पर जून के महीने में चढ़ाई का दौर शुरू हुआ। कुछ चीजों की महंगाई दर दोहरे अंकों में पहुंच गई। दालें, अंडे और मांस जैसे प्रोटीन या पौष्टिक उत्पादों की कीमतों में क्रमिक वृद्धि पिछले कुछ महीनों से मजबूत रही है।
वैसे आशा है, अगले कुछ महीनों में बाजार में नई फसल आने के बाद सब्जियों की कीमतों में गिरावट आएगी। अभी भी मौसम का असर बाजार पर हावी है। मौसम स्थिर और अनुकूल होने के बाद ही महंगाई काबू में आएगी। वर्षा में हालिया सुधार के बावजूद इस दक्षिण-पश्चिम मानसून सत्र में प्रमुख खरीफ फसलों की बुआई पर अभी दबाव बना हुआ है। बहुत से किसानों को अभी इंतजार है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अभी जो परिस्थिति है, उसमें भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरों में किसी भी संभावित कटौती की शुरुआत में देरी कर सकता है। वैसे यह ध्यान रखना चाहिए कि मौसम और आपूर्ति में आने वाली कमी हमेशा हमारे वश में नहीं होती है। अत धैर्य रखना चाहिए।
टमाटर का सितम
यह मानना चाहिए कि सब्जियों की महंगाई ने खेल बिगाड़ दिया है, पर इसका टमाटर की ऊंची कीमतों से कोई खास लेना-देना नहीं है। टमाटर की कीमत तो तुलनात्मक रूप से इस बार कम है। टमाटर पिछले साल के जून जितने महंगे नहीं हुए हैं और लगभग 65 प्रतिशत की मासिक उछाल के बावजूद साल-दर-साल स्तर पर देखें, तो जून में टमाटर की कीमत में 35 प्रतिशत की कमी दिखती है।
हालांकि, टमाटर जुलाई में मुद्रास्फीति क्षेत्र में वापस आकर अहम भूमिका निभा सकता है। गौर करने की बात है कि टमाटर की कीमतों में चालू जुलाई महीने में ही ज्यादा तेजी आई है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि जुलाई में अब तक भारत भर में कीमतें जून की तुलना में औसतन 198 प्रतिशत अधिक और जुलाई 2022 की तुलना में 146 प्रतिशत अधिक हैं। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मुद्रास्फीति की टोकरी में टमाटर का केवल 0.57 प्रतिशत योगदान है। वैसे भी सब्जियों को महंगाई में बहुत अधिक अस्थिरता लाने के लिए जाना जाता है। कुछ अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि अगर सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रही, तो जुलाई में मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा को छू सकती है।
दालों का दबाव कायम
दालों और संबंधित उत्पादों की कीमतों में माह-दर-माह के आधार पर उछाल दिखता है, और उनकी वर्ष-दर-वर्ष दर अब दोहरे अंकों में 10.5 प्रतिशत है। दालें प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ हैं, जिनकी कीमतों पर कड़ी नजर रखी जाती है, क्योंकि आबादी का एक बड़ा हिस्सा आवश्यक पोषक तत्वों के लिए इन पर निर्भर रहता है। हालांकि, समय-समय पर उतार-चढ़ाव आम हैं, लेकिन सक्रिय नीतिगत हस्तक्षेपों के चलते दालों की कीमतों पर नियंत्रण रखा जाता है। क्रिसिल ने पिछले सप्ताह अपनी एक शोध रिपोर्ट में बताया है कि नवंबर 2015 और जुलाई 2017 के बीच, दालों की मुद्रास्फीति 25 प्रतिशत तक कम होने से पहले 46 प्रतिशत तक बढ़ी भी थी। मतलब, दालों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बने रहने की संभावना है।
क्रिसिल ने यह भी कहा है कि मूल्य स्थिरीकरण योजनाओं के माध्यम से निरंतर सरकारी हस्तक्षेप यह सुनिश्चित कर सकता है कि कीमतों या महंगाई का अगला चरम कम तीव्र रहेगा। हालांकि, पिछले साल की तुलना में कम आपूर्ति और महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में अनियमित बारिश के कारण बुआई प्रभावित हुई है। ऐसे में, कीमतें ऊंची रहने की संभावना है। वैसे तुअर, उड़द और मसूर के लिए खरीद सीमा हटाने से किसान दाल की अधिक बुआई के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं।
एक से दो महीने में राहत की संभावना
व्यापारी और किसान सब्जियों की मौजूदा कीमत में बढ़ोतरी के लिए कई कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। शुरुआती तीव्र गर्मी, उसके बाद रुक-रुक कर बारिश और अंतत अब अधिक बारिश ने सब्जी आपूर्ति शृंखला को बाधित कर दिया है। अनियमित आपूर्ति ने बाजार में कमी पैदा कर दी है, जिससे कीमतों में तेज उछाल आया है। अब कई तरह की आशंकाएं हैं। अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आ सकती है, जो मिट्टी के पोषक तत्वों को बहा सकती है और फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है। वास्तव में, बहुत अधिक पानी से फसलें जलमग्न हो सकती हैं। भारत की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति पांच महीने में पहली बार, जून में, बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई है, इसलिए भी उसकी चर्चा ज्यादा हो रही है। उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (सीएफपीआई) जून 2023 में बढ़कर 4.49 प्रतिशत हो गया, जबकि मई महीने में यह 2.43 प्रतिशत और पिछले वर्ष जून में 7.75 प्रतिशत था।
यह भी कहा जा रहा है कि फरवरी में गर्मी की लहर और मानसून में देरी के चलते आपूर्ति में कमी आई है, जिससे टमाटर की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है, और यह एक या दो महीने तक जारी रहने की उम्मीद है, जब तक कि नई खरीफ फसल बाजार में नहीं आ जाती है।
समग्र अर्थव्यवस्था पर असर
गौरतलब है कि इस साल की शुरुआत में, भारतीय रिजर्व बैंक ने अचानक मौसम परिवर्तन और अल नीनो के प्रभाव के कारण मुद्रास्फीति को लेकर चिंता व्यक्त की थी। केंद्रीय बैंक ने अपनी पिछली दो मौद्रिक नीति बैठकों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी रोक दी है। हालांकि, सब्जियों की कीमतों में उछाल से मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ने की संभावना है, जिससे निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना कमजोर होगी। इसका समग्र अर्थव्यवस्था पर भी कुछ असर होगा। उच्च मुद्रास्फीति से लोगों की क्रय शक्ति कम हो सकती है, जिससे उपभोक्ताओं के खर्च का तरीका और समग्र आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। वैसे दुनिया के ज्यादातर देशों की तुलना में भारत में महंगाई अभी भी बहुत कम है, लेकिन उससे पूरी राहत के लिए हमें कुछ इंतजार करना होगा।