
,एटा रंग महोत्सव मानवाधिकार के मंच तले से—
अरे पैसे बालों गरीबी खरीदो—-
गरीबी का रोंडा हुआ आज बचपन,
न जाने किधर से किधर जाएगा,
बड़ी बेरहम भूंख की आग है,
ये खुदकी बुझाने में,किसको जलाएगा,,
नन्हे चिरागों से बिकता हुआ तेल,
वतन के उजाले कहीं बिक न जाए,,
अरे पैसे बालों गरीबी खरीदो,
यही रोता बचपन अमन चैन का,
सौदागर बन जलाएगा,,
दीप्ति,