
विजय राघव गढ कलहरा भुमिकेश्वर धाम बाबा भोंडस नाथ की प्राचीन तपोभूमि । जबलपुर जिले मे दो प्राचीन मेले जो कि मकरसंक्रांति पर्व पर प्राचीनतम मेले जाने जाते हैं । पहला मेला चिर कुवारी नर्मदा के भे ड़ा घा ट वा दूसरा मेला विजय राघव गढ के कलहरा ग्राम के भुमिकेश्वर धाम मे मकरसंक्रांति पर्व पर आयोजित होने वाले अति प्राचीन मेले हैं । विजय राघव गढ भुमिकेश्वर धाम के मेले की परम्परा वेदिक युग से जुड़ी एक अनूठे नाथ संप्रदाय के महात्मा भोंडस नाथ की तप स्थली के कारण जानी जाती है ।विंध्य पर्वत कीकेमौर वेली मे प्राचीन काल मे भोंडस नाथ विंध्य की कंदरा मे तपस्या करते थे । उनके पास एक तिलिस्मी तुम्मी थी जो कि महात्मा की आवस्यकताओ की पूर्ति करती थी। घी शक्कर तेल तथा जो भी महात्मा को आवस्यकता होती थी उसकी पूर्ति तुम्मी करती थी। एक समय भोंडस नाथ जी अपने शिष्य के साथ संक्रांति पर्व के समय नर्मदा स्नान करने गये हुए थे । स्नान के समय वह तिलिस्मी तुम्मी नर्मदा की धारा मे बह गई । चेले ने गुरुजी से कहा कि तुम्मी तो बह गई बाबा भोंडस नाथ ने कहा कि वह वापस आ जावेगी किन्तु एक वर्ष व्यतीत होने के बाद भी तुम्मी वापस नही आई । दूसरे वर्ष मकरसंक्रांति पर्व पर बाबा भोंडस नाथ भुमिकेश्वर धाम मे जब स्नान करने गये वही तुम्मी जल कुण्ड मे बहती हुई आकर भोंडस नाथ के पास वापस आ गई ।जनश्रुतियों के मुताबिक कलहरा भुमिकेश्वर धाम मे मकरसंक्रांति का यह मेला सबसे प्राचीनतम मेला माना जाता है । विन्ध्य पर्वत भी अनादिकाल से ऋषियो मुनियो की तप साधना का केंद्र रहा है ।महर्षि अगस्त्यमुनि मार्कंडेव मुनि भी विंध्य की प्राकर्तिक सुषमा की कंदराओं मे तपस्या की थी ।जिनसे मिलने त्रेता युग मे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम लक्ष्मण सीता समेत विंध्य मे आकर भेंट की थी । भारतेन्दु युगीन प्रवर साहित्यकार ठाकुर जगमोहन सिह जी ने अपने जगत प्रसिध उपन्यास श्यामा स्वप्न मे लिखा है कि या ही मग ह्वय के गये
दंडक वन श्री राम तासौ पावन देश यह । विन्ध्या टवी लताम ।।
यह वही पावन छेत्र है चित्रकूट से वन गमन के समय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की रज से विभूषित स्थल ।मान्यता है कि भुमिकेश्वर धाम मे स्थापित शिव लिंग श्री राम जी के द्वारा पूजित है । आज प्रशासनिक उदासीनता व राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव के कारण मेले का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है ।भुमिकेश्वर जल कुण्ड भी रख रखाव व अनियंत्रित खनन के चलते विलुप्त होता जा रहा है । पण्डित सुरेन्द्र दुबे पत्रकार विजय राघव गढ़ ।