
“लोकतंत्र में जवाबदेही पर सवाल: एटा मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर की मनमानी, प्राचार्या ने पत्रकारों के नंबर किए ब्लैकलिस्ट”
एटा।
स्वतंत्र भारत की बुनियाद लोकतंत्र और जवाबदेही पर रखी गई थी, जहां प्रेस को ‘चौथा स्तंभ’ कहा गया। लेकिन एटा मेडिकल कॉलेज में हालात कुछ और ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। यहां डॉक्टरों की मनमानी और प्रशासन की जवाबदेही से बचने की कोशिश ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला एटा मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर से जुड़ा है, जिन की कार्यशैली को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि डॉक्टर मनमाने ढंग से कार्य कर रहे हैं। जब इस संबंध में कॉलेज की प्राचार्या से संवाद स्थापित करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने बातचीत करने से इनकार कर दिया।
इतना ही नहीं, प्राचार्या ने उन पत्रकारों के मोबाइल नंबर तक ब्लैकलिस्ट कर दिए जो कॉलेज में हो रही गतिविधियों की सच्चाई सामने लाना चाह रहे थे। यह कदम न केवल प्रेस की आज़ादी पर हमला है, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना के भी विपरीत है।
पत्रकारों का कहना है कि जब उन्होंने मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की कार्यशैली और अव्यवस्था पर रिपोर्टिंग की, तो प्राचार्या ने संवाद स्थापित करने की जगह संवाद बंद कर दिया। क्या यह वही आज़ाद भारत है, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने बलिदान दिया था?
जनता को जवाब देने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर है, वही अगर सवालों से बचने लगें, तो ये संकेत बेहद चिंताजनक हैं। लोकतंत्र में जनता के सेवक कहे जाने वाले अधिकारी अगर सवाल पूछने पर प्रेस से दूरी बनाने लगें, तो जवाबदेही का क्या मतलब रह जाता है?
यह घटना सिर्फ एटा की नहीं, बल्कि उस सोच की मिसाल है जिसमें सत्ता का अहंकार सेवा भावना पर हावी होता जा रहा है। लोकतंत्र की सेहत के लिए यह एक चेतावनी है।
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