
मोबाइल कॉल पर अमिताभ बच्चन की चेतावनी: जिंदगी बचाने में देरी का खतरा? भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने उठाया गंभीर सवाल ।
पत्रकार राम आसरे (केंद्रीय अध्यक्ष केंद्रीय अनुशासन समिति बी एम एफ)की खास रिपोर्ट।
नई दिल्ली:
मोबाइल फोन पर कॉल करने से पहले सुनाई देने वाली सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की ‘सावधान’ वाली चेतावनी को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है। भारतीय मीडिया फाउंडेशन के संस्थापक ए.के. बिंदुसार ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह चेतावनी आपातकालीन स्थितियों में लोगों की जान खतरे में डाल सकती है।
’38 सेकंड में 242 जिंदगी खाक’: आपातकाल में देरी का खतरा
बिंदुसार ने एक भयावह उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी: “38 सेकंड में 242 जिंदगी खाक हो गई।” वह पूछते हैं कि ऐसे किसी आपातकाल में, यदि कोई व्यक्ति फोन करता है, तो उसे पहले 30 सेकंड तक अमिताभ बच्चन की साइबर क्राइम या अन्य चेतावनी सुननी पड़ती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर किसी व्यक्ति को अचानक हार्ट अटैक आ जाए या वह किसी गंभीर दुर्घटना का शिकार हो जाए, तो वह साइबर क्राइम से तो शायद बच जाए, लेकिन यमराज से नहीं बच सकता क्योंकि चेतावनी सुनने में कीमती समय बर्बाद हो जाता है।
बार-बार चेतावनी और उसकी प्रासंगिकता पर सवाल
ए.के. बिंदुसार ने यह भी कहा कि दिन में एक बार कॉल करने पर इस तरह की चेतावनी देना तो ठीक है, लेकिन 10 बार फोन करने पर 10 बार अमिताभ बच्चन की आवाज में चेतावनी सुनना कहाँ तक उचित है? उनका मानना है कि यह अनावश्यक है और इससे उपयोगकर्ताओं को परेशानी होती है, खासकर जब वे जल्दी में हों या किसी आपात स्थिति में हों।
सरकार और मोबाइल कंपनियों से हस्तक्षेप की मांग
इस गंभीर मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करते हुए, बिंदुसार ने भारत सरकार से इस पर विचार करने और मोबाइल फोन कंपनियों को सख्त निर्देश जारी करने की अपील की है। उनका स्पष्ट मत है कि सिम कंपनियों को इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि “थोड़ी सी सुधार करने पर करोड़ों की जिंदगियां बच सकती हैं।” उनका यह बयान देशवासियों के लिए एक सीधा संदेश है कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सभी को ध्यान देना चाहिए।
यह मुद्दा वाकई सोचने पर मजबूर करता है कि क्या महत्वपूर्ण सार्वजनिक जागरूकता संदेशों को प्रसारित करने के अन्य तरीके हो सकते हैं, जो आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों के समय की बर्बादी न करें और उनकी जान बचाने में बाधा न बनें। सरकार और दूरसंचार कंपनियों को इस संतुलन को साधने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।