कटनी के बाद जबलपुर में वकील ने लगाया मौत को गले

खरी – अखरी *ठीक एक साल में पलट गये पन्ने*

कटनी के बाद जबलपुर में वकील ने लगाया मौत को गले

आज से ठीक एक साल पहले कटनी में अधिवक्ता मनीष पाण्डेय ने भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में मौत को गले लगाया था जिस परिस्थिति में जबलपुर के अधिवक्ता अनुराग साहू ने आत्महत्या की है।

तब 01 अक्टूबर 2021 को खरी – अखरी ने अपने आलेख मगरमच्छों द्वारा अपने हिस्से को हडपे जाने से जान देने मजबूर हो रही छोटी मछलियां शीर्षक में वकीलों की आंतरिक पीड़ा को उजागर करने का प्रयास करते हुए लिखा था कि वकालती पेशे में किस कदर मगरमच्छ एवं बड़ी मछलियां छोटी मछलियों के हिस्से को हडप जाती हैं। उससे छोटी मछलियों के पास एकमात्र आसान रास्ता बचता है आत्महत्या करना।

आज फिर एक बार उन्ही पन्नों को पलट कर रख दिया है जबलपुर के अधिवक्ता अनुराग साहू ने अपनी जीवनलीला का दी एंड कर दिया।

यह अलहदा है कि जहां अधिवक्ता अनुराग साहू की आत्महत्या ने जबलपुर के अधिवक्ताओं को आक्रोशित कर दिया और राज्य अधिवक्ता परिषद को सम्पूर्ण प्रदेश के अधिवक्ता संघों को विरोध स्वरूप न्यायिक कार्य से विरत रहने का आव्हान करना पडा, जिसकी गूंज सुप्रीमकोर्ट और बार काउंसिल आफ इंडिया तक सुनाई दी, खबर ने अखबारों में प्रमुखता से सुर्खियां बटोरी वहीं अधिवक्ता मनीष पाण्डेय की आत्महत्या नक्कारखाने में गुम होकर रह गई। स्वाभाविक था जब अपने अधिवक्ता की असामयिक मौत को जिला अधिवक्ता संघ कटनी ने हवा हवाई कर दिया तो फिर पुलिस को रद्दी की टोकरी में डालने से कौन रोक सकता था। अखबारों ने भी किसी कोने में सिर्फ खबर छापने की औपचारिकता निभाई।

सुप्रीमकोर्ट, हाईकोर्ट से लेकर निचली अदालतों में गले तक भरे हुए वकीलों की सेहत पर रत्तीभर प्रभाव न तो कभी पड़ा है और न पड़ने वाला है। भुगतान भुगतता है केवल पीड़ित परिवार। टाप से लेकर बाटम तक के अधिवक्ता संघ तो अधिवक्ता की मौत से उपजे अंगारों का इस्तेमाल केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए करते आए हैं आज भी कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।

यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि अधिवक्ताओं के बीच में से ही कुछ की पैसे कमाने की हवस से वकालत जैसा सम्माननीय पेशा देह व्यापारी पेशे से भी निम्नस्तरीय बनकर रह गया है। यहां पर भी मानवीय मूल्यों की जगह दानवीय मूल्यों को ज्यादा तरजीह दी जाने लगी है। नए और औसत दर्जे की वकालत कर रहे वकीलों के केसों को तोड़ने में कोई संकोच नहीं किया जाता है।

वकालती पेशे का पतन तो यहां तक दिखाई देता है कि कुछ श्रेणियों में तो वकालत की जगह विशुद्ध दलाली की जाती है, सौदेबाजी की जाती है। जो सामान्य स्तर के वकील को अंतिम यात्रा पर जाने के लिए मजबूर कर देती है।

अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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