बाह बनाम बंदिशें
शंकर देव तिवारी
कभी जहां थे डाकू जन्में
आज पडाकू जन्म रहे
कभी रही थी धरा कृष्ण की
आज खलाड़ी खेल रहे

वाह आगरा।हां वही बाह जहां बीहड़ थे चंबल के किनारे साथ में बहती है यमुना और दोआबा बनाती है उटंगन । कृष्ण की ननिहाल शोरीपुर उत्तर भारत की काशी बटेश्वर के साथ आजादी के दीवानों का गुरुकुल चलाने वालों का इतिहास जहां दफन है हां उसी बाह से खेल खिलाड़ी भी जन्में हैं । जिन्होंने खेत खलिहानों और बीहड़ के मैदानों से ही अभ्यास कर देश में ही नहीं विदेशों मेंभी बाह का परचम फहराया है। अभाव की तनिक भी रेखा माथे पर नहीं झलकती । सफलता में पिछड़े हों ऐसा नहीं मेडल से वंचित hon कदापि नहीं सम्मान से कुंठित हों बिलकुल नहीं बाह का खिलाड़ी , उसने जीता पाया और उसे मिला सब कुछ ।अर्जुन खेल का सम्मान एक को नहीं दो को मिला । एशिया, राष्ट्र कुल, ओलंपिक सभी जगह खेले ।विजय सिंह चौहान और अंकित शर्मा के प्रयास ओलंपिक तक के विसराये नहीं जा सकते एशियाड में उनके रिकार्ड सालों तक नहीं टूट सके थे। वो प्रेरक प्रेरणा बनके उभरे तभी कई ने बाह का परचम लगायत चहुं ओर फहराया । अजित भदौरिया का जुनून उसको श्रेष्ठ एथलीट बना अर्जुन अवॉर्ड दिला सका । रतन सिंह भदौरिया का अथक त्याग और प्रयास उन्हें सोना जीतने वाला धावक बना गया । मुझे याद है वो जब जीत कर आए थे तब उनसे मेने पूछा था क्या जापान के खिलाड़ी आपसे भिन्न थे तो वे बोले थे उनके स्पाइक अलग थे मगर मेरे चम्बल के रेत के ट्रैक से सख्त नहीं थे । बहुत कुछ किस्से कहानी बाह के परचम फहराने वाले खिलाड़ियों के वर्ष 84से लिखता चला आ रहा हूं । मगर अफसोस बाह के खिलाड़ी गोल्ड अर्जुन देकर भी हमारे प्रयासों के बाद भी एक मैदान बाह तहसील में बनवा सके । एक डकैत जिस गांव का हो गया वहां थाना तो खोल दिया जाता है मगर दो दो अर्जुन अवॉर्ड लेने के बाद भी स्टेडियम की नींव तक नहीं रखने दी जाती ।
मैं मानता हूं और सभी जानते हैं राजनेतिक आयाम में भी हम एक सैफई गांव से कम नहीं थे । मगर नैतिकता के धनी अटल जी की पेत्रक भूमि बाह के साथ उनकी पार्टी को तो ध्यान में रखना चाहिए था । उनकी मौत के बाद तो यह सब कुछ नहीं हो सका ।
उत्तर भारत का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बटेश्वर हो या खिलाड़ियों की जननी बाह की कहानी में चार चांद तो लग जाने चाहिए थे । मगर हमे हमारी बंदिशों ने आज तक बांध रखा है । दोष सीधे तौर पर राजनेतिक आकाओं पर मढ हम अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते हैं । इन परम्परागत बंदिशों से निजात पाने के लिए मिलजुलकर प्रयास करने होंगे ।खेल का शिक्षा का माहोल बनाना होगा तभी हम अपनी प्रतिभाओं को बाह में निखार यहीं बसाना होगा । जिससे अगली पीढ़ी का धमाल देख सकेंगे ।
मुझे याद है खेल के लिए जो माहोल भदावर विद्यामंदिर ने बाह तहसील में बनाया था । खेल का सामान ठेले में भरकर खरीदा जाता था । पंजाब जाते थे भदावर विद्यामंदिर के संस्थापक स्वर्गीय श्री बनवारी लाल तिवारी । उनके अपने नियम सिद्धांत थे बच्चे स्वयं बनें । जिसके लिए उन्होंने खेल को माध्यम बनाया था । सन 60से 70के बीच में तहसील बाह का गांव गांव भदावर के इस अभियान का अंगीकार बना था । गोला, जेवलिन, वालीबाल, और अन्य सामान खेल के स्कूल भंडार में नहीं छात्रों के सीधे हाथों गांवों में पहुंचे थे । तब जो खेल पनपा डाकू भटका और विजय सिंह रट्नसिंह जेसे खिलाड़ियों को जन्मा ।
हमारी आयोजन और स्पर्धी छमता से कायल कई बार समय खुद हुआ । हमारे बाह के स्कूल से अंबाह में जब वालीबाल में एक फोर्स की टीम हारी तो उसका कोच बार बार कहता रहा जीतने वाली टीम का नाम जिला बाह की टीम लिख दो भदावर विद्यामंदिर नहीं ।
आओ उसी भदवार विद्यामंदिर के परिसर से एक अभियान की शुरुआत करते हैं पंजा कुश्ती के दंगल के आयोजन से एक स्टेडियम के लिए नहीं केवल फिर से ओलंपिक में परचम फहराने के लिए ।
दूर तक नहीं जाना
बस कान में है फुसफुसाना
मंजिले तो दूर हैं
बस बंदिशों को है मिटाना
शंकर देव तिवारी