आज भी खड़े हैं गाँव •••~~

● *कोरोना वैश्विक महामारी ने एक ही झटके मे पूरे विश्व का सामाजिक आर्थिक भूगोल बदल कर रख दिया है। भारत के संदर्भ मे यदि देखें, तो कोरोना महामारी ने भारी तबाही तो मचाई ही है, लेकिन बहुत कुछ नया सोचने पर भी मजबूर कर दिया है।*
● *भारत की आत्मा यहाँ के 65 लाख गाँवों में बसती है, लेकिन पिछले अनेक दशकों में करोड़ों ग्रमीण मजदूर/ किसान गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर गये थे। इनमें से अधिकांश मजदूर वर्ग तो रोजी रोटी की तलाश में गाँव छोड़ गया था और तमाम संपन्न किसानों और पढ़े लिखे युवाओं को शहरों की चकाचौंध और विलासिता ने अपनी ओर आकर्षित कर लिया था, परिणामतः गाँव उजाड़ जैसे हो गये थे, गाँव बूढ़े हो गये थे। खेत खलिहान उदास और मलीन हो गये थे ~ बेशक ! गाँव में रोजगार बहुतायत में नहीं थे, या लगातार घटते चले गए तथा समय-समय पर तमाम प्राकृतिक आपदाओं ने खेती किसानी और फसलों को नष्ट करके कंगाली का वातावरण पैदा कर दिया। परिणामस्वरूप गाँव के गाँव खाली हो गये। जो बच्चे पढ़ाई के लिए शहर गये, वे फिर गाँव को ओर वापस लौट कर नही आए ~ लेकिन बूढ़े और बेबस गाँव टकटकी लगाये उनकी राह निहारते रहे और उनकी कराह से यही शब्द फूटते रहे कि लौट आओ मेरे लाल ~ “आज भी खड़े हैं गाँव”।*
● *प्रकृति ने फिर से परिवर्तन की करवट ली और पिछले दिनों की महामारी के भयावह रूप ने गाँव लौटने की भावना को बलवान कर दिया। लाखों करोड़ों मजदूर/ किसान गाँवों की ओर लौट पड़ा। वीरान गाँव आबाद होने लगे, लेकिन रोजी रोजगार की समस्या तो जस की तस ही है न, इसलिए नयी संभावनाओं की खोज जरूरी है, क्योंकि सर्वेक्षणों के अनुसार वापस लौट कर आए किसानों, मजदूरों तथा नौजवानों के पास न तो कोई जमा पूँजी है और न ही फिलहाल गाँवों में कोई रोजी रोजगार है। समस्या बहुत भयावह, खौफनाक तथा बेहद चिंताजनक है। लोकाचार की मदद कितनी और कितने दिन मिल सकेगी ~ यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर किसी के पास नही है।*
● *सरकार की मनरेगा योजना का लाभ इनको एकदम से मिलना भी संभव नही दिख रहा है। सरकारी कागज और फाइलें अपनी परंपरागत रफ्तार से ही चलेंगी न ?*
● *ऐसे में एक नयी इबारत लिखनी होगी। एक नयी यात्रा शून्य से शुरू करनी होगी।*
● *वर्तमान मे एक सेवानिवृत्त समाज सेवी आई ए एस डाॅ कमल टावरी एक ऐसा नाम है, जो पिछले अनेक वर्षों से गाँवो को समृद्ध तथा आत्मनिर्भर बनने की दिशा में घनघोर तपस्या कर रहे हैं और अब उनकी तपस्या के सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे हैं। उनकी योजना है कि गाँव के स्तर पर ही असरकारी सामुदायिक प्रयासों से गाँवों का कायाकल्प किया जा सकता है।*
● *डाॅ कमल टावरी जी की टीम के एक विशेषज्ञ डाॅ के पी सिंह भदौरिया ने इन योजनाओं मे से एक योजना के बारे में बताया है कि ~ “किसान उत्पादक संगठन बनाओ~ फायदा उठाओ” योजना पर भारत सरकार 5000 करोड़ रुपये खर्च करने जा रही है। इसलिए हर गाँव में किसानों को “किसान उत्पादक संगठन” बनाकर इसका लाभ उठाना चाहिए।*

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