
बरेली। भारत में बाइक या स्कूटर पर पीछे बैठी महिलाओं को अक्सर दोनों पैर एक तरफ रखकर बैठे देखा जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?
यह सिर्फ एक बैठने का तरीका नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी है सदियों पुरानी सामाजिक और सांस्कृतिक कहानी।
इतिहासकारों के अनुसार महिलाओं के साइड में बैठने की परंपरा की शुरुआत यूरोप के पुराने राजघरानों से जुड़ी मानी जाती है। उस दौर में महिलाएं भारी-भरकम परिधान पहनती थीं और सामाजिक मान्यताओं के चलते घोड़े पर पुरुषों की तरह बैठना उचित नहीं माना जाता था। इसलिए “साइड सैडल” यानी दोनों पैर एक तरफ रखकर बैठने की शैली को अपनाया गया।
ब्रिटिश काल के दौरान यह परंपरा भारत तक पहुंची और धीरे-धीरे समाज का हिस्सा बन गई। जब स्कूटर और बाइक आम हुए तो महिलाओं का इसी अंदाज में बैठना एक सामान्य दृश्य बन गया।

हालांकि इतिहास गवाह है कि भारतीय महिलाओं ने हर चुनौती को तोड़ा है। वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने घोड़े पर सवार होकर युद्धभूमि में अपनी वीरता का परिचय दिया था। यह साबित करता है कि महिलाओं की क्षमता कभी किसी एक परंपरा या सीमा में बंधी नहीं रही।
आज की नारी समय के साथ आगे बढ़ रही है। वह बाइक चलाने से लेकर विमान उड़ाने तक हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही है।
अब महिला सिर्फ किसी के पीछे बैठने वाली नहीं, बल्कि खुद अपनी मंजिल तय करने वाली शक्ति बन चुकी है।
क्योंकि नारी अब अबला नहीं… आत्मविश्वास, साहस और सफलता की नई पहचान है।