
हम नहीं तुम बोलो तो शायद सुनवाई हो जाए…..
युवा ही उक्त जमींन को श्रम दान कर खेलने योग्य बनाने का का करेंगे
बाह। आगरा की तहसील बाह में एक साल पहले सेना की भर्ती देखने की तैयारी में जुटे तीन अभ्यर्थी सड़क पर दोड लगाते समय मारे गए थे जिसे आज स्टेडियम के न होने के कारण हूआ हादसा मान बाह मे स्टेडियम को जल्द बनबाने की मांग की गई। साथ ही खेल जगत के युवा अब उक्त जमींन को खुद के श्रम दान से ही खेलने योग्य बनाने का अभियानं चलाने का मन बना रहे हैं।
सही मांग की गई है । फौज की क्या रोजी रोटी की मारा मारी और जिंदगी की आपा धापी में दोड की होड़ सड़क पर ले आई और बेचारी तीन निरीह प्रतिभाओं की इहलीला समाप्त हो गई थी। उनके लिए एक सड़क हादसा था जिनसे हम स्टेडियम की अपेक्षा पिछले ३८साल से तो में खुद करता आ रहा हूँ। तो अब मेरा मानना है हम नहीं अब तुम बोलो तो शायद व्यवस्था गत सुनवाई हो जाए। मैं खबर से ८७ में जुड़ा अमर उजाला, आज, विकास शील, सैनिक, भास्कर, से बी पी एन तक लिखता ही रहा हूँ। अभी पिछले दिनों दोनों जन प्रतिनिधियों की कार गुजारी की कलई खोली तो एक ने मुझे चुनाव लड़ने की चुनोती तक दी। मगर उसके बाद भी उक्त विभाग में मैं और अनिल गुप्ता जब गए तो इन मान नियों की पोल खुली।
बाह में मेरी याद में ९०के दशक में स्टेडीयम् के लिए देवता ने जगह दान की जिसके लिए भूमि संरक्षण विभाग को दस लाख रुपये तत्काकींन सांसद प्रभु दयाल कठेरिया ने अपनी निधि से तब दिया जब बाह के युवाओं ने भूख हड़ताल की। मगर उस जमींन को विवादित बना कर स्टेडियम नही बनने देने वाले अब भी आका बने हुए हैं जब कि उस जमींन पर एक स्कूल बन गया है। और वो आका आज भी वही अलाप पीट रहे हैं। वर्तमान में जिस जमीन पर स्टेडियम प्रस्तावित है को विभाग को दिए तीन साल हो गए। बड़ागांव का उप ग्राम उगन पूरा की आबादी बाली खाली जमींन मिनी स्टेडीयसम् के लिए दी गई है उसका पांच साल का समय समाप्ति की कगार पर है प्रस्ताव तक नहीं शासन के पास पंहुचा है। हम लोग जब जिला युवा कल्याण अधिकारी से मिले तो उसने बताया की अभी तक उक्त जमीन का मिनी स्टेडियम लाइक है कि नहीं बाला निरीक्षण रपट तक नहीं लोक निर्माण विभाग से लग सकी है। ये बात दोनों ही जन नेताओं को बता दिया गया है पर अब तक कोई सक्रियता नहीं दिखाई है। पिछले सप्ताह ही हम लोग विकास भवन जाने के लिए निकले थे और लगातार ३८ साल से किये जाने वाले प्रयास जारी हैं और रहेंगे । उल्लेखनीय रहे खेल मंत्री ग्रीस यादव, खेल निदेशक, और युवा कल्याण के अधिकारी बाह में प्रस्तावित मिनी स्टेडियम से अन विज्ञ ही दिखे तब हम दोनों ने संजय प्लेस स्थिति कार्यालय जाकर फाइल लोक निर्माण विभाग को भिजवाई। पता चला है उक्त बाबू उस फाईल को लखनऊ भेजे तब कुछ उसकी होने की साँसे पता चले। हां यदि माननीय चाहें तो एक ही दिन में सब काम हो सकता है। मगर गंगा को कोन सिर बांधे। स्टेडीयम बन गया तो इनकी राजनीति खत्म हो जायेगी शायद। जैसे पोस्ट मार्टेम्, रेल, नहर, जैसे काम उनके स्तर को सार्वजनिक बनाते गए हैं इससे और आम जन बनने से वे भय खा रहे हैं तोभी खेल ही जीवन है के सिद्धान्त को पूर्ण नहीं होने देना चाहते हैं।
स्टेडियम का अभाव शहीद होने को ,पलायन को मजबूर तो कर रहा है साथ ही हीनता से जीवन को भी निष्ठुर बनाए हुए है।इंतजार ही हमारा अब लक्ष्य बन चुका है अब युवा चाहें तो सब संभव है।
अब तो खुद ही उक्त जमीं पर श्रम दान कर खेलने योग्य बनाना शुरू कर अभियान चलाए तभी शायद प्रशासन और जन प्रतिनिधियों की नींद टूटे।
खेल जगत जल्द ही एक बड़ी बेठक कर उक्त अभियान की शुरुआत करेगा।