
सिंदरी (घनबाद):-11अप्रैल। शहरपुरा शिव मंदिर सिंदरी में नारी सेवा संघ एवं श्री राम कथा समिति के तत्वाधान में चल रही श्रीराम कथा के विराम दिवस नवे दिन की कथा मे पूज्या डॉक्टर अमृता करूणेश्वरी जी ने कथा में सुंदरकांड की कथा को विस्तार में कहते हुए बताया कि हनुमान जी महाराज के पास अतुलित बल था लेकिन उसके बाद भी उन्होंने कई स्थानों पर अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग किया हम युवकों को इससे सीख लेना चाहिए कि हर काम केवल शक्ति और बल से ही नहीं होता कुछ कार्यों के लिए स्वयं को छोटा भी करना होता है विनम्रता से भी काम लेना होता है जिस प्रकार से हनुमान जी महाराज ने दिया जब सुरसा ने अपना आकार बढ़ाना शुरू किया श्री हनुमान जी महाराज उससे दुगने बढ़ते गए और इसके बाद सौ योजन का मुंह जब सुरसा ने खोला श्री हनुमान जी महाराज ने एकदम लघु रूप धारण करके सुरसा के मुख्य में जाकर वापस आ गए इससे सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा श्री राम प्रभु को श्री हनुमान जी महाराज अति प्रिय थे क्योंकि श्रीराम जितना कहते थे श्री हनुमान जी महाराज उतना ही करते थे और उनका नाम हनुमान हुआ संत जन कहते हैं कि हनुमान कौन है जिसने अपने अंदर बैठे अहंकार का अभिमान का नाश कर लिया वही हनुमान है इसलिए हनुमान जी महाराज जो भी कार्य करते थे वह यह कहकर करते थे कि मुझ पर मेरे श्री राम प्रभु की कृपा है इसलिए मैं यह कार्य सफल कर पाया। इसके बाद देवी जी ने विस्तार से किस प्रकार हनुमान जी महाराज ने माता सीता से अशोक वाटिका में भेंट की और रावण को समझाया लंका को जलाया और माता सीता का पता लगाकर श्री राम प्रभु के पास वापस गए रामसेतु की स्थापना रामेश्वरम की स्थापना भगवान ने की नल नील बांधों की सहायता से पुल बनाकर भगवान लंका आए और लंका आकर की रावण के साथ युद्ध हुआ जिसमें मेघनाथ द्वारा श्री लक्ष्मण जी की शक्ति किस प्रकार लगी उसका झांकी के रूप में वर्णन किया गया और अंततः देवी जी ने विस्तार में बताया कि भगवान ने इस युद्ध के विराम में 31 बाणो का संधान संधान किया जिसमें एक बाण ने रावण की नाभि कुंड में जो अमृत उसको सूखा 30 बार रावण के सिर और भुजाओं में लगे और रावण की मृत्यु हुई और मृत्यु होते समय रावण के मुख से भगवान का नाम निकला इसलिए रावण को मुक्ति प्रदान हुई और सभी ने देखा कि रावण की शरीर से एक दिव्य ज्योति निकली जिसे भगवान ने अपने अंतःकरण में स्थान दिया और उसे परम गति प्रदान हुई इसके बाद श्री राम का राज्याभिषेक और शिवजी ने पार्वती जी को इस कथा का विराम कहकर बताया कि कलयुग में केवल नाम ही आधार रहेगा कलयुग का मनुष्य नाम के आधार पर इस भवसागर को पार कर पाएगा और कथा का विराम किया।