शिक्षकों के व्यक्तित्त्व विकास में सहायक है नाट्य विद्या।

शिक्षाशास्त्र विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ मे शिक्षक प्रशिक्षुओं हेतु आयोजित” नाट्य विद्या की प्रासंगिकता ” विषयक
विशिष्ट व्याख्यान के अन्तर्गत विशिष्ट वक्ता प्रो. अरुण जैन , आई आई टी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं डॉ. शुभ्रा वर्मा , प्रभारी नाट्य कला विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, का स्वागत करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. शैलेन्द्र कुमार वर्मा ने कहा कि नाट्य विद्या की जानकारी प्रत्येक शिक्षक के लिए अत्यंत आवश्यक है. विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ वीणा वादिनी ने कहा कि शिक्षण कला का उद्देश्य कलाकार का निर्माण नहीं बल्कि कलाबोध और कलात्मक व्यवहार को विकसित करना है इसके लिए अलग से कला विषय की जरुरत नहीं है बल्कि हर विषय के शिक्षण मे कलात्मकता का पुट समाहित करना अधिक उपयोगी है जिसके उपयोग से बच्चे आत्मअभिव्यक्ति के महत्व के बारे मे सीखते हैं।
विशिष्ट वक्ता प्रो. अरुण कुमार जैन ने अपने वक्तव्य में कहा कि साहित्य मनुष्य को आनंद देता है, परन्तु उसकी अभिव्यक्ति का क्षेत्र सीमित होता है उस अभाव की पूर्ति ललित कलाएँ, नृत्य संगीत एवं दूसरी कलाएँ करती हैं शिक्षा मे नाटक और कला के प्रयोग से भी विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में तेजी आती है।
शिक्षा में नाटकों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए मुख्य वक्ता डॉ. शुभ्रा वर्मा ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में कला की चर्चा के कारण मनुष्य की अवधारणा एवं रसानुभूति दोनों उत्कर्ष को प्राप्त करते है और उसे कलात्मक अभिव्यक्ति पर अधिकार प्राप्त होता है। कार्यक्रम का संचालन डॉ दिनेश कुमार ने किया व
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ. राखी देब ने कहा कि यदि हमारी शिक्षा का उद्देश्य सर्वांगीण विकास हो तो हमारे पाठ्यक्रम मे कला का स्थान अन्यान्य पढाई लिखाई के विषयों के समान होना चाहिये।इस अवसर पर प्रो सुरेंद्र राम, प्रो रमा कांत सिंह, डॉ. ज्योत्सना राय, डॉ रमेश प्रजापति समस्त शिक्षक व विद्यार्थी उपस्थित थे।