
पिछले दिनों दिल्ली में एक अध्यापक को तीन बच्चों ने बुलाया। उनके हाथ पकड़े और लगातार चाकू से वार किए। इन तीन में से दो सगे भाई थे। कारण था कि अध्यापक ने उन्हें स्कूल यूनिफॉर्म न पहनने और समय पर न आने पर डांटा था। इससे ये बच्चे नाराज थे। पूछताछ में इन्होंने बताया कि अध्यापक पर हमले की साजिश वे बहुत पहले से रच रहे थे। इसके लिए उन्होंने चाकू भी ऑनलाइन मंगाया था।
शिक्षक पर हमले के कारण अध्यापकों में बहुत नाराजगी है। उन्होंने धरना दिया। उनके समर्थन में अन्य स्कूलों के शिक्षक भी बड़ी संख्या में आए। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने भी इस घटना की निंदा की है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। पुलिस ने भी कहा कि शिक्षकों की सुरक्षा के लिए हर स्कूल में दो पुलिस वालों की डॺूटी लगाई जाएगी।
लेकिन सवाल यह भी है कि बच्चों के मन में क्या चल रहा है, इसे कैसे जान पाएंगे? आखिर शहर के हर कोने पर तो पुलिस नहीं हो सकती। बच्चों के मन में यह बात आ ही कैसे रही है कि अगर किसी शिक्षक ने कुछ कह दिया, तो वह इतना बड़ा अपराधी हो गया कि उस पर हमला जरूरी है। बच्चों में यह हिंसा इतनी क्यों बढ़ रही है, साथ में उनका अहंकार भी? इसके लिए बहुत सारे लोग धारावाहिकों, फिल्मों, ओटीटी पर आने वाली तमाम तरह की सामग्रियों और हिंसा को ग्लैमराइज किए जाने वाले कार्यक्रमों को भी जिम्मेदार मानते हैं।
यह विचार भी कि बच्चों से कुछ कहना ही नहीं चाहिए, इस तरह की घटनाएं, इसी सोच का परिणाम हैं। आखिर बच्चों को गलत बात के लिए क्यों नहीं टोकना चाहिए? जिन देशों से यह विचार अपने यहां तक आया, उन्हीं में से एक ब्रिटेन में कुछ साल पहले हुए एक सर्वे में माता-पिता ने कहा था, वे चाहते हैं कि बच्चों को गलत काम करने की सजा दी जाए।
अपने यहां पिछले दिनों से ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं, जहां अगर अध्यापक बच्चों को डांटते हैं, तो माता-पिता न केवल लड़ने आते हैं, अध्यापकों के साथ मारपीट भी करते हैं। दिल्ली के ही एक स्कूल में कुछ माह पहले झगड़े में माता-पिता ने अध्यापक का सिर फोड़ दिया था। आक्रामकता यदि माता-पिता में हैं, तो बच्चे भी यही सीखेंगे। एक दौर वह था कि यदि स्कूल से कोई शिकायत आती थी, तो माता-पिता अध्यापकों से कहते थे कि बच्चों को और डांटें, बल्कि घर पर भी कभी बच्चों का पक्ष नहीं लिया जाता था। उन्हें डांट ही पड़ती थी। इसीलिए बच्चे किसी भी गलत काम को करने से बचने की कोशिश करते थे। डर बहुत सी गलत बातों को करने से रोकता भी है, लेकिन बहुत से संगठनों में बच्चे क्या करें, क्या न करें, इसे बताने की होड़ लगी रहती है और ज्ञान बिना किसी जिम्मेदारी की भावना के दे दिया जाता है।
जैसा कि ऊपर बताया गया कि बच्चों ने चाकू ऑनलाइन मंगाया। मतलब इंटरनेट पर खोजा। आजकल ज्ञान के लिए बच्चों को अपने बड़ों के पास नहीं जाना पड़ता। इंटरनेट पर भरपूर ज्ञान उपलब्ध है और अधिकांश बच्चों के हाथों में मोबाइल भी है। सूचना युग की यह बड़ी भारी मुश्किल है। हर तरह का ज्ञान आपकी हथेलियों के बीच मौजूद है। अच्छा और बुरा। जाहिर है, जब आप गुस्से से भरे हों और बदला लेना चाहते हों, तो बुरी सूचनाओं की तरफ ही जाएंगे। विशेषज्ञ इसे एंगर मैनेजमेंट से जोड़ते हैं। कहा जाता है कि इन दिनों माता-पिता भी बच्चों से बातचीत नहीं करते हैं। बहुत से माता-पिता के पास बच्चों की भावनाओं को समझने का वक्त नहीं है और बहुतों के पास यह सोच नहीं है। अधिकांश माता-पिता को लगता है कि बच्चों को स्कूल भेज दिया, तो उनकी जिम्मेदारी खत्म। वे नहीं जान पाते कि बच्चे क्या पढ़ रहे हैं और उनका वास्ता किन साथियों से है।
अधिकांश अध्यापक इस बात की शिकायत करते हैं कि इन दिनों बच्चों से कुछ कहा नहीं जा सकता। तमाम कानूनों के तहत, उन्हें किसी प्रकार की सजा नहीं दी जा सकती। डांटा भी नहीं जा सकता। एक नामी स्कूल के प्रधानाचार्य ने बताया था कि उनके स्कूल पर सौ से ज्यादा मुकदमे चल रहे हैं। समस्या और विकराल हो, इससे पहले निदान खोजना चाहिए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)