मेरा हिसाब कर दे, ऐ जिंदगी
बहुत थक गया हूं मेहनत
करते – करते ।
*आज उठा है फिर मज़दूर,*
*एक रोटी की आस में।*
*चल पड़ा है रेल की पटरी*
*पर*
*अपने परिवार से मिलने*
*की आस में ।।*
मध्य प्रदेश के मजदूर रोटी को सीने से लगाए बढ़ते रहे अपनी मंजिल के लिए , मंजिल तक तो नहीं पहुंचे मौत ने गले लगा लिया।
यह हमारी विडंबना है , जिंदा आदमी को कोई नहीं पूछता , मरने के बाद हर शख्स उनके लिए
दिखावे का चोला ओढ़ कर संवेदनाएं पेश करता हैं । यही हाल हुआ इन मजदूरों का जब तक जीवित थे, पैदल चलते रहे , मरने के बाद उनके शवों को स्पेशल ट्रेन से उनके क्षेत्र तक पहुंचाया गया ।
किसी मजदूर की मां, किसी की बेटी और किसी की पत्नी अपने बेटे , पिता या पति के इंतजार में नजरे जमाए बैठी होंगी । रेल की पटरी पर रोटियां बिखरी पड़ी थी टूटी हुई चप्पल इस हादसे की कहानी बयां कर रही थी कुछ कागज के नोट इधर-उधर बिखरे पड़े थे खून के धब्बों में मुस्कुराती गुड़िया पड़ी हुई थी , शायद कोई बाप अपनी बेटी के लिए यह गुड़िया खरीद कर ले जा रहा होगा
यह सब मजदूर मध्य प्रदेश के रहने वाले थे, और जालना की एसआरजी कंपनी में मजदूरी का काम करते थे । यह सब मजदूर गुरुवार की सुबह 7:00 बजे जालना से निकले थे शुक्रवार सुबह 4:00 बजे जब यह मजदूर थक कर चूर हो गए और इनके पैरों ने चलने से जवाब दे दिया तो जिस रेल की पटरी पर चल रहे थे उसी पर लेट गए , नींद ऐसी लगी मौत ने गले लगा लिया इन मजदूरों को पता ही नहीं चला ।
खून के निशानों से यह बात साफ हो गई जो खून का रंग गरीबों का होता है, वैसा ही खून का रंग अमीरों का होता है । जब खून का रंग अमीर और गरीब में भेदभाव नहीं करता तो अमीरों को किस बात का घमंड है, रहा सवाल पैसो का तो लक्ष्मी बड़ी चंचल होती है एक जगह नहीं रुकती आज तुम्हारे पास है ,कल किसी और के पास होगी । बड़े-बड़े राजा महाराजा और नवाबों के वंशज आज भीख मांग रहे हैं । मत करो घमंड पैसों का कब दिन पलट जाए तुम्हारे यह नहीं पता ।
*ऐ सियासत, तूने भी इस*
*दौर में कमाल कर दिया,*
*गरीबों को गरीब अमीरों*
*को माला-माल कर दिया।*