
बरेली। कान्हा उपवन गौशाला को लेकर उठे सवाल अब सिर्फ सड़कों, ज्ञापनों और सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहे। गौवंश की देखभाल और गौशाला की व्यवस्थाओं को लेकर आवाज उठाने वाली कान्हा उपवन सेवा संघर्ष समिति के समर्थन में जनपद न्यायालय के अधिवक्ता भी मैदान में उतर आए हैं। 14 सितंबर को पंचम होटल के सामने जारी समर्थन पत्र ने साफ संकेत दे दिया है कि अब इस प्रकरण में भावनाओं से ज्यादा कानून, दावों से ज्यादा दस्तावेज और सफाइयों से ज्यादा जवाबदेही की मांग होगी।
अधिवक्ताओं ने समिति के शांतिपूर्ण एवं वैधानिक प्रयासों का समर्थन करते हुए निष्पक्ष, पारदर्शी और विधि-सम्मत जांच की जरूरत पर जोर दिया है। यानी अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि किसने क्या कहा, बल्कि यह है कि कान्हा उपवन में वास्तव में हुआ क्या?
और यहीं से जिम्मेदार तंत्र के सामने असली सवाल खड़े होते हैं—
गौवंश की मौतें हुईं तो उनके कारणों का प्रमाणित रिकॉर्ड क्या है?
बीमार पशुओं के इलाज की व्यवस्था थी तो चिकित्सकीय अभिलेख कहां हैं?
चारा और पानी पर्याप्त था तो उसका नियमित रिकॉर्ड और निगरानी व्यवस्था क्या कहती है?
सफाई और रखरखाव की व्यवस्था दुरुस्त थी तो मौके की वास्तविक स्थिति और निरीक्षण रिपोर्ट में कितना मेल है?
अगर समिति के आरोप गलत हैं तो तथ्यों के साथ उनका खंडन क्यों नहीं किया जाता?
और अगर कहीं लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करने में देर किस बात की?
सबसे बड़ा सवाल—क्या गौशाला चलाना केवल बजट, निरीक्षण और कागजी रिपोर्टों की जिम्मेदारी है, या वहां मौजूद हर जीवित गौवंश की जिंदगी की भी जवाबदेही तय होगी?
अधिवक्ताओं का समर्थन किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का प्रमाण नहीं है और न ही समर्थन पत्र स्वयं किसी आरोप को सिद्ध करता है। लेकिन इस पत्र ने एक बात जरूर स्पष्ट कर दी है कि मामले को दबाने या आरोपों को महज शोर बताकर खारिज करने के बजाय अब निष्पक्ष जांच की मांग को गंभीरता से लेना होगा।
क्योंकि यदि व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है तो स्वतंत्र जांच सबसे बड़ा बचाव बन सकती है। और यदि जांच में खामी निकलती है तो जिम्मेदारी से बचने के रास्ते भी बंद होने चाहिए।
अब जनता यह जानना चाहती है कि कान्हा उपवन की व्यवस्था के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? निगरानी किसकी है? निरीक्षण कौन करता है? रिपोर्ट कौन बनाता है? खामियां मिलने पर कार्रवाई कौन करता है? और यदि किसी स्तर पर लापरवाही साबित होती है तो जवाबदेह अधिकारी या संस्था के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी?
गौसेवा के नाम पर तालियां बटोरना आसान है, लेकिन बेजुबानों की मौत और दुर्दशा के सवाल पर जवाब देना कठिन।
अब मामला नारे का नहीं, नतीजे का है।
दावे का नहीं, दस्तावेज का है।
और सबसे बढ़कर—जवाबदेही का है।
कान्हा उपवन में अगर सब ठीक है तो जांच से तस्वीर और साफ होगी; अगर कुछ गलत है तो सच सामने आना ही चाहिए। आखिर गौवंश के नाम पर चल रही व्यवस्था में जवाबदेही भी किसी की तो होगी!