
बरेली। मनुष्य जीवन ईश्वर का दिया हुआ अनमोल अवसर है। हम रोजमर्रा की भागदौड़, महत्वाकांक्षाओं और भविष्य की योजनाओं में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वर्तमान जीवन की कीमत ही भूल जाते हैं। जबकि भारतीय दर्शन सदियों से मनुष्य जन्म को दुर्लभ और महत्वपूर्ण मानता आया है।
विवेकचूड़ामणि में कहा गया है— “दुर्लभं त्रयमेवैतत्…” अर्थात मनुष्य जन्म, सत्य को जानने की इच्छा और श्रेष्ठ लोगों का सान्निध्य दुर्लभ है। इसलिए महत्वपूर्ण यह नहीं कि हमने कितने वर्ष जिए, बल्कि यह है कि उन वर्षों को किस तरह सार्थक बनाया।
समय कभी लौटकर नहीं आता। प्रेम, सपने और अच्छे कार्यों को कल पर टालने के बजाय आज को बेहतर बनाने की जरूरत है। समय का सम्मान ही जीवन का सम्मान है।
श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, परिणाम पर नहीं। इसलिए अपने दायित्व को ईमानदारी, अनुशासन और पूरी निष्ठा से निभाना ही जीवन की सच्ची साधना है।
जीवन की सार्थकता केवल धन, पद और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि दूसरों के काम आने में है। ज्ञान मिला है तो बांटें, शक्ति मिली है तो कमजोर का सहारा बनें और संसाधन मिले हैं तो जरूरतमंद की मदद करें। जीवन तब बड़ा बनता है, जब उसमें ‘मैं’ से आगे ‘हम’ शामिल होता है।
हर दिन स्वयं से पूछें—आज मैंने क्या सीखा, किसके जीवन में कुछ अच्छा जोड़ा और अपने भीतर क्या बेहतर किया?
“चरैवेति चरैवेति”—चलते रहें, सीखते रहें और सेवा करते रहें।
क्योंकि जीवन मिलना सौभाग्य है, लेकिन उसे सार्थक बनाना हमारा दायित्व है।